गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशानिर्देश

Posted on
  • Wednesday, April 14, 2010
  • by
  • Shah Nawaz
  • in
  • Labels: , , ,
  • हमें विस्तार से पता होना चाहिए कि इस्लाम के अनुसार मुसलमानों को गैर-मुसलमानों के साथ कैसे संबंध रखने चाहिए और कैसे उनके साथ इस्लामी शरी'अह के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए?


    सब तारीफें अल्लाह के ही लिए हैं.
    पहली बात तो यह कि इस्लाम दया और न्याय का धर्म है. इस्लाम के लिए इस्लाम के अलावा अगर कोई और शब्द इसकी पूरी व्याख्या कर सकता है तो वह है न्याय".

    मुसलमानों को आदेश है कि ग़ैर-मुसलमानों को ज्ञान, सुंदर उपदेश तथा बेहतर ढंग से वार्तालाप से बुलाओ.  ईश्वर कुरआन में कहता है (अर्थ की व्याख्या):


    [29: 46] और किताबवालों से बस उत्तम रीति से वाद-विवाद करो - रहे वे लोग जो उनमे ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है. और कहो: "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो हमारी और अवतरित हुई और तुम्हारी और भी अवतरित हुई. और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं."

    [9:6] और यदि मुशरिकों (जो ईश्वर के साथ किसी और को भी ईश्वर अथवा शक्ति मानते हैं) में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले. फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दो; क्यों वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं है.

    इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, या डराने की, या आतंकित करने, या उसकी संपत्ति गबन करने की, या उसे उसके सामान के अधिकार से वंचित करने की, या उसके ऊपर अविश्वास करने की, या उसे उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, या उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की जबकि उनका माल खरीदा जाए. या अगर साझेदारी में व्यापार है तो उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.

    इस्लाम के अनुसार यह मुसलमानों पर अनिवार्य है गैर मुस्लिम पार्टी के साथ किया करार या संधियों का सम्मान करें. एक मुसलमान अगर किसी देश में जाने की अनुमति चाहने के लिए नियमों का पालन करने पर सहमत है (जैसा कि वीसा इत्यादि के समय) और उसने पालन करने का वादा कर लिया है, तब उसके लिए यह अनुमति नहीं है कि उक्त देश में शरारत करे, किसी को धोखा दे, चोरी करे, किसी को जान से मार दे अथवा किसी भी तरह की विनाशकारी कार्रवाई करे. इस तरह के किसी भी कृत्य की अनुमति इस्लाम में बिलकुल नहीं है.


    [अल-शूरा 42:15, अर्थ की व्याख्या]:
    "और मुझे तुम्हारे साथ न्याय का हुक्म है. हमारे और आपके प्रभु एक ही है. हमारे साथ हमारे कर्म हैं और आपके साथ आपके कर्म."

    इस्लाम यह अनुमति अवश्य देता  है कि अगर ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का एलान करें, उनको उनके घर से बेदखल कर दें अथवा इस तरह का कार्य करने वालो की मदद करें, तो ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.

    [60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.

    [60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.


    क्या इस्लाम काफिरों का क़त्ल करने का हुक्म देता है?

    कुछ लोग इस्लाम के बारे में भ्रान्तिया फ़ैलाने के लिए कहते हैं, कि इस्लाम में गैर-मुसलमानों को क़त्ल करने का हुक्म है. इस baren में ईश्वर के अंतिम संदेष्ठा, महापुरुष मौहम्मद (स.) की कुछ बातें लिख रहा हूँ, इन्हें पढ़ कर फैसला आप स्वयं कर सकते हैं:

    "जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)


    "जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)

    "जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)

    "न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)

    "अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).



    एवं पवित्र कुरआन में ईश्वर कहता है कि:

    इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्‍ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]

    - शाहनवाज़ सिद्दीकी

    39 comments:

    Tarkeshwar Giri said...

    Tum unki gardane utaro, aur unke por-por par chot pahunchawo , ye bhi likha hai kuran main, iske bare main kya kahenge.

    सलीम ख़ान said...

    ek bar punh aapne sabit kar diya ki aap islam ke eksachche SIPAHI hai

    Dr. Ayaz ahmad said...

    बहुत अच्छा शाहनवाज़ भाई @गिरी साहब आप सचमुच समझना चाहते है क़ुरआन शरीफ़ को तो ठीक तरह से पढ़े ये बेवकूफ़ो की तरह बीच मे से उठाकर सवाल न करेँ आपको वैसे इसका जवाब भी मिलेगा

    Shah Nawaz said...

    @ Tarkeshwar Giri ji

    Tum unki gardane utaro, aur unke por-por par chot pahunchawo , ye bhi likha hai kuran main, iske bare main kya kahenge.

    तारकेश्वर जी, आपके प्रश्न का उत्तर तो मैं पहेले ही दे चूका हूँ. शायद आपने ध्यान नहीं दिया. फिर भी आपके ध्यानाकर्षण के लिए फिर से लिख देता हूँ.

    इस्लाम यह अनुमति अवश्य देता है कि अगर ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का एलान करें, उनको उनके घर से बेदखल कर दें अथवा इस तरह का कार्य करने वालो की मदद करें, तो ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.

    Shah Nawaz said...

    अब तो आपको पता चल ही गया होगा कि इस्लाम किसके साथ युद्ध करने का हुक्म देता है. अगर कोई मेरे घर अथवा मेरे देश पर आक्रमण करेगा तो मैं अवश्य ही कुरआन-ऐ-करीम का अनुसरण करते हुए उनकी गर्दने उतारूंगा और उनके पोर-पोर पर चोट पहुंचाऊंगा.

    Shah Nawaz said...

    तारकेश्वर जी, कम से कम अच्छी बातों का तो समर्थन कर दिया कीजिये. आपसे एक ब्लॉगर के नाते रिश्ता बन गया है, इसलिए कम से कम इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है?

    safat alam taimi said...

    बड़ा अच्छा लेख प्रस्तुत किया शाह नवाज़ भाई आपने। लोगों को बस आपत्ति करना आता है समझने के इच्छुक हों तब ना...और विरोद्ध भी कर रहे हैं किसका... अपनी ही धरोहर का.

    safat alam taimi said...

    1. कुरआन शान्ति का संदेश देता है। इस्लाम का उद्देश्य पूरे संसार में शान्ति स्थापित करना है। इस्लाम हर धर्म का सम्मान करता है। क़ुरआन में इनसानी जानों का सम्मान इतना किया गया है कि उसने किसी एक व्यक्ति (चाहे उसका धर्म कुछ भी हो)की हत्या को सारे संसार की हत्या सिद्ध करता हैः जो कोई किसी इनसान को जबकि उसने किसी की जान न ली हो अथवा धरती में फसाद न फैलाया हो, की हत्या करे तो मानो उसने प्रत्येक इनसानों की हत्या कर डाला और जो कोई एक जान को ( अकारण कत्ल होने से) बचाए तो मानो उसने प्रत्येक इनसानों की जान बचाई”(सूरः माईदा आयत न0 32) और मुसलमान जिस नबी को अपनी जान से अधिक प्रिय समझते हैं वह प्रत्येक संसार के लिए दयालुता बन कर आए थे ” (हे मुहम्मद)हमनें आपको सम्पूर्ण संसार के लिए दयालुता बना कर भेजा है ” (सूरः अंबिया 107) मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में आता है ” जो कोई इस्लामी शासन में रहने वाले गैर मुस्लिम की हत्या कर दे वह स्वर्ग की बू तक न पाएगा” (सही बुख़ारी)
    देखा! यह है इस्लाम की शिक्षा… और हम सब इसी पर 100 प्रतिशत विश्वास रखते हैं। एक मुस्लिम कभी किसी गैर-मुस्लिम को गैर-मुस्लिम होने के नाते किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचा सकता इसलिए कि वह जानता है कि हम सब एक ही माता पिता का सन्तान हैं।

    safat alam taimi said...

    2. ज़रा आप मुहम्मद सल्ल0 की आदर्श जीवनी का अध्ययन कर के देख लिजीए उनके शत्रुओं ने उनको और उनके अनुयाइयों को निरंतर 21 वर्ष तक हर प्रकार से सेताया, कितनों को जान से मार दिया, घर से निकाला लेकिन सब को सहन करते रहे यहाँ तक कि 21 वर्ष तक अत्याचार सहते सहते जब अन्त में मक्का पर विजय पा चुके तो सार्वजनिक क्षमा की घोषणा कर दी। जिसका परिणाण यह हुआ कि मक्का विजय के वर्ष उनके अनुयाइयों की संख्या 10 हज़ार थी तो दो वर्ष में ही एक अन्तिम हज के अवसर पर एक लाख चालीस हज़ार हो गई। क्यों वह सोचने पर विवश हुए कि जिस इनसान को हमने 21 वर्ष तक चैन से रहने नहीं दिया हम पर क़ाबू पाने के बाद हमारी क्षमा की घोषणा कर रहा है, मानो यह स्वार्थी नहीं बल्कि हमारी भलाई चाहता है।

    zeashan zaidi said...

    [60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.
    +1

    सुलभ § सतरंगी said...

    बहुत अच्छे से व्याख्या की है आपने.... सहमत हूँ... इस्लाम में न्याय का मार्ग उत्तम मार्ग है, यही लोगों को बताने की जरुरत है.

    एक जानकारी चाहूँगा, यदि कोई मुस्लिम तमाम लिखी गयी बातें, कुराने-करीम या हदीश में से कुछेक बात नहीं मानता है (वो बात जो आज के परिस्थिति में अनुसरण करना संभव नहीं है) तब भी क्या वो मुसलमान कहलायेगा?

    सुलभ § सतरंगी said...

    उपरोक्त, सन्दर्भ से एक बात तो स्पष्ट है, की बांग्लादेश, पाकिस्तान या ऐसे देश के सरकार(लोग) दोज़ख के भागी है. इस्लामी शासन के अंतर्गत, उन्होंने थोडा भी अन्याय किया तो वे स्वर्ग की खुशबू से वंचित रहेंगे.

    Shah Nawaz said...

    इसमें दो बातें हैं, एक तो यह कि अगर कोई उन बातों को सही नहीं मानता है, तो वह मुसलमान हो ही नहीं सकता है. दूसरी यह कि अगर कोई किसी वजह से किसी बात को मानने में अक्षम हो, तो वह इस्लाम से ख़ारिज नहीं होता है. जैसे कि इस्लाम में पांच समय नमाज़ पढना फ़र्ज़ है, इसमें अगर कोई पांच समय नमाज़ नहीं पढ़ पाता है तो वह केवल नमाज़ छोड़ने का गुनाहगार है, हो सकता है कि ईश्वर उसके इस गुनाह को माफ़ करदे या फिर उसकी सजा उसे दे. लेकिन वह इस गुनाह की वजह से वह इस्लाम से बाहर नहीं होता है.

    सुलभ § सतरंगी said...


    @शाहनवाज जी,
    त्वरित जवाब लिखने के लिए आपका शुक्रिया ! कुछ ऐसी ही बाते हमारे उस्ताद ने भी बताई थी जैसे सफ़र में हों तो रोज़ा रखना जरुरी नहीं है इत्यादि.... मेरे अधिकाँश दोस्त मुस्लिम ही हैं मगर वे इस्लाम के बारे में शुन्य या थोड़ी जानकारी रखते हैं. ठीक उसी प्रकार अधिकाँश हिन्दू विभिन्न रिवाज, नियम और ग्रंथों के बारे में सही जानकारी नहीं रखते.

    बहरहाल, आप तो हम जैसे नास्तिकों को "काफिर" समझते हैं... जबकि मैं मानवता का सेवक हूँ. मेरी समस्या एक ही है, किसी भी धर्मग्रन्थ में आस्था नहीं है.... हाँ कुछ अच्छी बाते जरुर उठा लेता हूँ सभी किताबों से... जैसे मैंने कुरआन/हदीश से एक पंक्ति लिया "अमानत में खयानत नहीं करनी चाहिए". पुराने वेद से लिया "सर्व धर्म समभाव", "वसुधैव कुटुम्बकम", गीता से लिया "परिवर्तन संसार का नियम है" इत्यादि इत्यादि और इसे गाँठ बाँध लिया.

    मुझे विश्वाश है, कुरआन या अन्य अच्छे धर्म ग्रन्थ का पालन किये बगैर भी मैं अच्छी जिंदगी बसर कर सकता हूँ, सबको साथ लेकर चल सकता हूँ. इसके लिए मुसलमान कहलाना जरुरी नहीं है.
    मैं अपने देश से इतर किसी धर्म को नहीं मानता हूँ, यही मेरी सुन्दरता का राज है. लेकिन जिद्दी लोगों को समझाना अपना फ़र्ज़ (नागरिक धर्म) समझता हूँ.

    SHIVLOK said...

    शाहनवाज़ जी अपने इतना अच्छा लिखा ,
    ये सब बातें सलीम ख़ान को भी समझाइये
    सलीम ख़ान ने महफूज भाई की एक पोस्ट पर टिप्पणी की ये बहुत अच्छी टिप्पणी थी | इस टिप्पणी की तो मैं तारीफ करता हूँ परंतु इससे पहले ये कुछ ऐसा कर चुके हैं जो ठीक नहीं | इनको समझाइये और इनका थोड़ा विकास कीजिए | इनकी टिप्पणी के जवाब में मैने महफूज के ब्लॉग पर टिप्पणी की है आपकी जानकारी के लिए उसे यहाँ जस का तस दे रहा हूँ :-

    @ saleem khan
    "very nice

    please provide me a T-SHIRT. Please..............."

    सलीम तुम एक काम करो
    महफूज भाई के कुत्ते की तस्वीर एक टी शर्ट पर छपवा कर पहनो तुम बहुत सुंदर लगोगे
    poem वाली टी शर्ट पहनने के लायक तो तुम अभी नहीं हो |
    वैसे मैं यह दिल से चाहता हूँ
    कि तुम अपना विकास करो
    प्यार करना सीखो हम भी तुमसे बहुत प्यार करना चाहते हैं
    poem वाली टी शर्ट पहनने के लायक बनो
    सबसे प्यार करो प्यार मिलेगा | नफ़रत करोगे तो नफ़रत चाहे ना मिले लेकिन प्यार नहीं मिलेगा |
    सबसे पहले अपने ब्लॉग से महफूज की कुत्ते वाली फोटो हटाओ
    फिर माफी माँगो | माफी मांगने से तुम छोटे आदमी नहीं बन जाओगे |
    अपनी ग़लतियों को स्वीकार करना सीखो बहुत आनंदित हो जाओगे|
    SHIV RATAN GUPTA
    9414783323

    vedvyathit said...

    aap khoob bhrm faila rhe hain aisa islam me nhi hai aap aadhi jankari de kr logon kobhrmit kr rhe hai
    phle aap poora kuran shrif dhyan se pdhe tb bat kren
    dhokha jor jbr dsti loot ka mal islam me sb jayj hai
    dr.ved vyathit

    tahoor rocks said...

    Peace be wid u all......

    @ ved vyathit...

    lagta hai apko quran ki bahut knwledge hai bhai jo aap salah de rahe hai acche se samajh kar padne ki...

    pehle apne VED PURAN etc to pad lijiye acche se jakar wo khud hi itne hai ki koi aadmi dusra dharmgranth padna to door apne hi granth nahi pad paega.....

    DR. ANWER JAMAL said...

    अरे वेद व्यथित जी ! अभी आप ब्लॉग जगत में घूम रहे हैं . हमारे सवाल का जवाब तो अपने आज तक न दिया . क्यूँ ?
    लो आज कि पोस्ट में वैदिक वैज्ञानिकों कि खोज देखो .

    http://vedquran.blogspot.com/2010/04/falsehood-of-love-jihad.html

    Mohammed Umar Kairanvi said...

    nice post हमारी अन्‍जूमन को आप पर फखर है, अन्‍जुमन के दोस्‍तों भाई शाहनवाज के सौजन्‍य से www.islamhindi.com पर काम शुरू हो गया है, भाई नवाज को दुआओं और मशवरों से नवाजें

    sahespuriya said...

    NICE POST

    Akhtar Khan Akela said...

    jnaab asslaamo alekum, aadaab arz he , saadr vnde nmste st shri kaal , aap ne anjumn ke zriye jo koshishen ki hen use allah god bhgvaan kaamyaab kre or isi koshish se mulk se nfrt kaa bhaav door hoke bhaai chaaraaa sdbhaavna ka mahol bnskegaa. akhtar khan akela kota rajasthan

    zeal said...

    Blog author must respond with patience and tranquility.


    A friendly tone will be appreciated.

    Why so bitter and hostile?

    Shah Nawaz said...

    @ सुलभ § सतरंगी
    उपरोक्त, सन्दर्भ से एक बात तो स्पष्ट है, की बांग्लादेश, पाकिस्तान या ऐसे देश के सरकार(लोग) दोज़ख के भागी है. इस्लामी शासन के अंतर्गत, उन्होंने थोडा भी अन्याय किया तो वे स्वर्ग की खुशबू से वंचित रहेंगे.


    आप बिलकुल सही कह रहे हैं, चाहे कोई सरकार हो अथवा व्यक्ति, जिसने भी किसी पद पर होते हुए अन्याय किया वह नरक का भोगी है. और जिसने न्याय किया उसका दर्जा इस्लाम के अनुसार सबसे ऊपर है.

    Shah Nawaz said...

    @ vedvyathit

    aap khoob bhrm faila rhe hain aisa islam me nhi hai aap aadhi jankari de kr logon kobhrmit kr rhe hai
    phle aap poora kuran shrif dhyan se pdhe tb bat kren
    dhokha jor jbr dsti loot ka mal islam me sb jayj hai
    dr.ved vyathit


    वेड व्यथित जी, इसमें भ्रम वाली कोई बात बाकी ही नहीं रही है. क्योंकि मैंने (हमेशा की तरह) कुरआन की आयतों (श्लोकों) को सबूत के तौर पर लिखा है. और मैं दावे के साथ कह रहा हूँ कि धोखा, जोर-ज़बरदस्ती, लूट का माल जैसी चीज़ें इस्लाम में जायज़ नहीं है.

    Shah Nawaz said...

    @ zeal
    मेरी तो धारणा ही यही है कि इंसान को हमेशा मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए, ताकि बात के महत्त्व का पता चल सके.

    zeal said...

    Shah nawaz` bhai-

    Kuchh prash jehan ko pareshaan karte hain, aapki izazat ho to agli tippani mein puchhon?

    Shah Nawaz said...

    आप बिलकुल मालूम कर सकते हैं! अगर मैं उनका उत्तर देने का सामर्थ्य रखता होऊंगा तो अवश्य दूंगा.

    zeal said...

    Shah Nawaz bhai-

    izazat dene ka shukriya...dar-dar ke ye prashn puchh rahi hun---

    1- why it is said in Islam to take revenge if someone beats or hurts you.?...Don't you think it promotes 'hinsa'?

    2-why most of the terrorists all over the world are muslim?

    3-you are a blogger, why do you write something related with religion....Don't you think it divides us?.

    4- Don't you think that our religion should be humanity?

    5- If you are an Indian then be secular !...why advocating Islam sitting in Hindi blogs?....Don't you have better topics to write about?

    6-Don't you think , time is changing and the world is going Global . So why don't you feel like mixing well with your fellow Indians, irrespective of their religion?

    7-Why Islam allows polygamy?...Its an outright insult of a woman !..For their physical pleasure they marry with many women. Can you imagine how disgusting it will look if a lady starts marrying many men in your religion?

    8- Fatwa- Why They issue Fatwa to sensible people who try to raise voice against anything wrong happening in Islam?

    9-Talak-...A lady committed to her husband for her entire life can be given Talak by repeating it merely three times?....Don't you think a woman also should be given any such right and be treated as equal?

    10- I have heard that higher education is not allowed in Islam for women. Is that true?....If it is so, it must be condemned.

    11- Why do you need to advocate your religion so much?....Don't you believe in live and let live?

    Shah Nawaj bhai...Time has changed...We need to change with time to rise high .

    PS- By the way,i am not a male...I am a lady named Divya.

    Thanks !

    Shah Nawaz said...

    @ zeal
    izazat dene ka shukriya...dar-dar ke ye prashn puchh rahi hun---

    दिव्या जी, इसमें डरने की क्या बात है? अगर किसी को भी कोई संदेह अथवा प्रश्न है, तो उसे मालूम करने का पूरा हक है, बशर्ते की मर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए मालूम किया जाए.

    1- why it is said in Islam to take revenge if someone beats or hurts you.?...Don't you think it promotes 'hinsa'?

    इस्लाम बदले को कभी भी प्रोत्साहन नहीं करता है, हाँ अगर बात न्याय की हो तो अलग बात है. अर्थात अगर कोई न्यायधीश न्याय करता है तो अलग बात है.

    मेरे गुरु मुहम्मद (स.) ने बतलाया कि (जिसका अर्थ है) "दूसरों पर अपने हक को हमेशा अदा करते रहा करो वहीँ अपने ऊपर दूसरों के हक को माफ़ करते रहा करो.

    वही दूसरी तरफ यह फ़रमाया कि "अगर किसी ने दुसरे की बुरी बातों के बदले में अच्छी बातें की तथा ताल्लुक तोड़ने वालों से ताल्लुक जोड़ा तो मैं ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि जन्नत (स्वर्ग) उस पर वाजिब (ज़रूरी) हो गई."

    Shah Nawaz said...

    2-why most of the terrorists all over the world are muslim?


    ऐसा कहना पूर्णत: सत्य नहीं है. आज भी विभिन्न देशों में विभिन्न पंथो के लोग आतंकवाद में लिप्त हैं.

    परन्तु फिर भी जो आतंकवाद आज मुस्लिम समाज में पनप रहा है वह चिंता का विषय है. दर-असल इसके पीछे लम्बी कहानी है. अमेरिका और इस्राईल जैसे देश एवं कुछ सांप्रदायिक संगठन काफी सालों से कुछ मुस्लिम देशो / समाज को समाप्त अथवा पराजित करने जैसी कोशिश में लगे हुए हैं. इससे एक कशमकश की स्थिति बन गई है और इस कारण मुस्लिम युवाओं में एक असंतोष की भावना घर कर रही है और इसी का फायदा आतंकवादी संगठन उठा रहे हैं.

    वहीँ अशिक्षा और बेरोज़गारी भी इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण है. अशिक्षा के कारणवश बहुत ज्यादा मुसलमानों को मालूम ही नहीं है, कि इस्लाम की क्या शिक्षाएं हैं. और इसी का फायदा उठा कर आतंकवादी संगठन लोगो को बेवक़ूफ़ बना कर अपनी योजनाओं में शामिल कर लेते हैं.

    Shah Nawaz said...

    3-you are a blogger, why do you write something related with religion....Don't you think it divides us?.

    अगर आपको किसी बात की जानकारी है, और अगर कोई उक्त बात पर प्रश्न करे या उसको गलत तरीके से अथवा उसकी जगह कोई झूट बात फैला कर लोगो को भ्रमित करने की कोशिश करे, तो आपका फ़र्ज़ बनता है कि सही जानकारी को लोगो को बताया जाए ताकि झूट और मिथ्या भ्रम समाप्त हो.

    आज अनेको झूटी बातें और मिथ्या भ्रम हमारे देश मैं फैलाये जा रहे हैं. और इसी कारण आपस में दूरियां बढ़ रही हैं. जो मेरे विचार से तो झूट और भ्रम को समाप्त करके आपस में प्रेम और सौहार्द का वातावरण तैयार करना ही सच्चा देश प्रेम है.

    वैसे भी अगर आपको किसी बात की जानकारी है आपको लगता है कि वह बात दूसरों के लिए फायदेमंद है, तो आप अवश्य चाहेंगे कि वह बात दूसरों को पता चले. हाँ यह अवश्य है कि यह दूसरों पर छोड़ देना चाहिए, कि वह उक्त बात को सही माने अथवा नहीं.

    हमारा सामाजिक बातों पर लिखने का प्रयास भी यही होता है, कि समाज को फायदा पहुंचे. आप चाहे तो सामाजिक विषयों पर मेर ब्लॉग देख सकती हैं.

    http://premras.blogspot.com

    zeal said...

    shukriya !

    हरीश सिंह said...

    आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

    हरीश सिंह said...

    aapke blog par kai bate achchhi lagi. main inhe padhan achunga. phir aayenge. khuda hafiz..

    Awadhesh Pandey said...

    Bahut khoob, lekin shayad kuchh log islam ki galat vyakhya bhi kar deten hain.

    चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

    बहुत ख़ूब! धनतेरस और दीपावली की ढेरों मंगल कामनाएं!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 12-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1061 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    विनोद सैनी said...

    चर्चामंच के द्वारा आपके ब्लाग पर आना हुआ , आपको तथा आपके ब्लाग के पाठको को विनोद सैनी तथा (युनिक ब्‍लाग ) की तरफ से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाऐ
    यूनिक तकनकी ब्लाग पर भी पधारे

    डा. श्याम गुप्त said...

    १-[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.
    = आपसे धर्म के मामले में विरोध रखने वालों से आप बुरा व्यवहार कर सकते हैं, करना ही चाहिए ...

    [60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.
    = जो आपके धर्म को न मानें उनसे मित्रता न करो उनके मित्रों से भी नहीं |
    -------इसे प्रकार के विभिन्न गूढ़ व नकारात्मक आदेशों अनुदेशों से भरी हुई है कुरआन ....

    ---भई.. किसी भी किताब में गैर-मुस्लिम व मुस्लिम , मित्रता न करें, धर्मयुद्ध किया या न किया उनसे दोस्ती करो उनसे नहीं ...आदि शब्द व तथ्य आने का अर्थ ही है वह किताब ही असंगत है आगे और कहानी की आवश्यकता ही नहीं है...क्या किसी अन्य धर्म ग्रन्थ में एसा वाक्य व तथ्य हैं क्या ...

    Shah Nawaz said...

    @ डा. श्याम गुप्त जी

    = आपसे धर्म के मामले में विरोध रखने वालों से आप बुरा व्यवहार कर सकते हैं, करना ही चाहिए ...


    = जो आपके धर्म को न मानें उनसे मित्रता न करो उनके मित्रों से भी नहीं |



    आपने शायद ढंग से पढ़ा नहीं, पहली बात तो बूरा व्यवहार करने के लिए नहीं कहा गया बल्कि मित्रता से रोका गया और वह भी धर्म के मामले में विरोध रखने वालों से नहीं बल्कि वहां लिखा है की "जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे घर से निकाला"

    यह उन लोगो के लिए कहा गया जिन्होंने मुसलमानों पर हमला करके मुल्क पर कब्ज़ा करने और उन्हें उनके घरों से बेदखल करने की कोशिश की थी यानि कौम और मुल्क के खुले दुश्मन।


    और इससे अभिप्राय यह है कि ऐसे लोगो को छोड़कर बाकी लोगो से मित्रता की जा सकती है,
    बल्कि न्याय का हुक्म भी दिया।