ब्लॉग निरस्त करवाने की धमकियाँ!

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  • Thursday, April 22, 2010
  • by
  • Shah Nawaz
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  • ब्लॉग "प्रेम रस" के लेख "एक-दूसरे के धर्म, आस्था अथवा लेखों की आलोचनाओं में व्यतीत होता समय" पर कुछ लोगों ने मुझे मेरा ब्लॉग निरस्त होने की धमकी दी!

    उन लोगो को तो मैंने जवाब दे दिया. पर मैं आप लोगो से मालूम करना चाहता हूँ कि क्या गलतियाँ केवल एक तरफ से हो रही है? क्या चुप-चाप कमेंट्स करने वाले लोग वहीँ हैं जिन्हें आप सोच रहे हैं? यह भी तो हो सकता है, कि उनकी जगह एक-दुसरे को लड़वाने वाले लोग ऐसे कमेंट्स कर रहे हों?

    मेरे ब्लॉग पर धमकी देने वालो को मेरा जवाब:
    "आपने मेरा गैंग तो बता दिया, चलते-चलते अपना गैंग भी बता देते? वैसे यह गैंग-वैंग की सोच आप जैसों की हो सकती है.

    वैसे आपको बताता चलूँ, कि मैं पक्का मुल्ला (एक इस्लामिक डिग्री धारक) तो नहीं हाँ पक्का मुसलमान अवश्य हूँ. और एक मुसलमान होने पर मुझे पूरा गर्व है, बिलकुल ऐसे ही जैसे किसी को भी अपने धर्म पर गर्व होता है.

    रही बात ब्लॉग निरस्त होने की, तो यह धमकी किसी ओर को दीजियेगा, यहाँ ना तो धमकियों से डरने वाले लोग हैं और ना धमकियों के बदले में दूषित भाषा का प्रयोग करने वाले. वैसे आप हैं कौन धमकी देने वाले?

    चलिए मैं आपको ही चैलेंज दिए देता हूँ, मेरा एक भी लेख अथवा टिप्पणी को ढूंड कर दिखा दीजिये, जिससे किसी की भी भावना आहत हुई है? है दम?


    किसी की भावनाओं को नुक्सान पहुँचाना ना तो मेरे संस्कारों में है और ना ही मेरे धर्म के शिक्षाओं में. उलटे दूसरों की भावनाओ का ख्याल रखने की शिक्षा दी है मेरे गुरु मुहम्मद (स.) ने. विश्वास नहीं होता है तो "हमारी अंजुमन" में पब्लिश हुआ मेरा लेख पढ़कर देखिये, जहाँ सिर्फ लफ्फेबाज़ी नहीं बल्कि बल्कि सबूतों के साथ बातें हैं.

    "गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशानिर्देश"

    Wednesday, April 14, 2010


    हमें विस्तार से पता होना चाहिए कि इस्लाम के अनुसार मुसलमानों को गैर-मुसलमानों के साथ कैसे संबंध रखने चाहिए और कैसे उनके साथ इस्लामी शरी'अह के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए?


    सब तारीफें अल्लाह के ही लिए हैं.
    पहली बात तो यह कि इस्लाम दया और न्याय का धर्म है. इस्लाम के लिए इस्लाम के अलावा अगर कोई और शब्द इसकी पूरी व्याख्या कर सकता है तो वह है न्याय".

    मुसलमानों को आदेश है कि ग़ैर-मुसलमानों को ज्ञान, सुंदर उपदेश तथा बेहतर ढंग से वार्तालाप से बुलाओ.  ईश्वर कुरआन में कहता है (अर्थ की व्याख्या):


    [29: 46] और किताबवालों से बस उत्तम रीति से वाद-विवाद करो - रहे वे लोग जो उनमे ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है. और कहो: "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो हमारी और अवतरित हुई और तुम्हारी और भी अवतरित हुई. और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं."

    [9:6] और यदि मुशरिकों (जो ईश्वर के साथ किसी और को भी ईश्वर अथवा शक्ति मानते हैं) में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले. फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दो; क्यों वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं है.

    इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, या डराने की, या आतंकित करने, या उसकी संपत्ति गबन करने की, या उसे उसके सामान के अधिकार से वंचित करने की, या उसके ऊपर अविश्वास करने की, या उसे उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, या उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की जबकि उनका माल खरीदा जाए. या अगर साझेदारी में व्यापार है तो उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.

    इस्लाम के अनुसार यह मुसलमानों पर अनिवार्य है गैर मुस्लिम पार्टी के साथ किया करार या संधियों का सम्मान करें. एक मुसलमान अगर किसी देश में जाने की अनुमति चाहने के लिए नियमों का पालन करने पर सहमत है (जैसा कि वीसा इत्यादि के समय) और उसने पालन करने का वादा कर लिया है, तब उसके लिए यह अनुमति नहीं है कि उक्त देश में शरारत करे, किसी को धोखा दे, चोरी करे, किसी को जान से मार दे अथवा किसी भी तरह की विनाशकारी कार्रवाई करे. इस तरह के किसी भी कृत्य की अनुमति इस्लाम में बिलकुल नहीं है.

    जहाँ तक प्यार और नफरत की बात है, मुसलमानों का स्वाभाव ग़ैर-मुसलमानों के लिए उनके कार्यो के अनुरूप अलग-अलग होता है. अगर वह ईश्वर की आराधना करते हैं और उसके साथ किसी और को ईश्वर अथवा शक्ति नहीं मानते तो इस्लाम उनके साथ प्रेम के साथ रहने का हुक्म देता है. और अगर वह किसी और को ईश्वर का साझी मानते हैं, या ईश्वर पर विश्वास नहीं करते, या धर्म के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और ईश्वर की सच्चाई से नफरत करते है, तो ऐसा करने के कारणवश उनके लिए दिल में नफरत का भाव आना व्यवहारिक है.

    [अल-शूरा 42:15, अर्थ की व्याख्या]:
    "और मुझे तुम्हारे साथ न्याय का हुक्म है. हमारे और आपके प्रभु एक ही है. हमारे साथ हमारे कर्म हैं और आपके साथ आपके कर्म."

    इस्लाम यह अनुमति अवश्य देता  है कि अगर ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का एलान करें, उनको उनके घर से बेदखल कर दें अथवा इस तरह का कार्य करने वालो की मदद करें, तो ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.

    [60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.

    [60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.


    क्या इस्लाम काफिरों का क़त्ल करने का हुक्म देता है?

    कुछ लोग इस्लाम के बारे में भ्रान्तिया फ़ैलाने के लिए कहते हैं, कि इस्लाम में गैर-मुसलमानों को क़त्ल करने का हुक्म है. इस baren में ईश्वर के अंतिम संदेष्ठा, महापुरुष मौहम्मद (स.) की कुछ बातें लिख रहा हूँ, इन्हें पढ़ कर फैसला आप स्वयं कर सकते हैं:

    "जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)


    "जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)

    "जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)

    "न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)

    "अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).



    एवं पवित्र कुरआन में ईश्वर कहता है कि:

    इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्‍ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]

    - शाहनवाज़ सिद्दीकी

    14 comments:

    EJAZ AHMAD IDREESI said...

    आप कलम से सच्चे सिपाही हो

    उल्लू का पठ्ठा said...

    श्री शाहनवाज़ सिद्दीकी डरों नहीं...शांति का सन्देश फैलाते रहो!

    kunwarji's said...

    wo lekh aapka sach me badi imaandaari se likha huaa kekh tha!

    kunwar ji,

    zeashan zaidi said...

    जब लोगों को इस्लाम और मुसलमान नाम ही से बुखार आ जाता है तो क्या कहा जा सकता है.

    सलीम ख़ान said...

    right !!!


    जब लोगों को इस्लाम और मुसलमान नाम ही से बुखार आ जाता है तो क्या कहा जा सकता है.

    Mohammed Umar Kairanvi said...

    वाह भाई शाहनवाज यह उन लोगों के लिये जवाब भी है जो खामखाह कहते रहते हैं उन्‍हें धमकियां दी जा रही हैं, ऐसा होता तो ऐसे पब्लिश होती, पब्लिश होती तो बात सबके सामने रख सकते

    बहुत बढिया
    , दुआ भी करते रहिये, दुआओं से बहुत बडे-बडे काम होते रहे हैं

    Dr. Ayaz ahmad said...

    ठीक कहा शाहनवाज़ भाई

    Dr. Ayaz ahmad said...

    क्या भावनाएं केवल इन लोगो की ही जो आजतक चुप थे अभी तो जवाब आए है अगर सवाल कर लिए तो क्या हाल होगा

    Suresh Chiplunkar said...

    "..."जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)"।
    ओके… चलो मान लेते हैं…। लेकिन अब यह "महान शिक्षा" पाकिस्तान और कश्मीर में जाकर कौन सिखायेगा?

    Mohammed Umar Kairanvi said...

    @ Suresh Chiplunkar जी, अनवर साहब के शब्‍दों में पाकिस्‍तान अखण्‍ड भारत का ही हिस्‍सा है इस लिये आखिर हम अपना हिस्‍सा लेलेंगे फिर आप ही उन्‍हें शिक्षा देना तैयारी कर लो, जो बोले कुन्‍डा वो कुन्‍डा खोले,

    आप उर्दू सीख लें फिर उधर उर्दू एग्रीगेटर पर स्‍वयं सिखा सकते हो? हमने सोच भी रखी है पर इधर अपने भाइयों में जो मस्‍ती है उधर कहाँ मिलेगी

    MLA - Mohd Liaqat Ali said...

    Bilkul sahi jawab diya hai Shahnawaz bhai. Befikr raho aap apni jagah ekdum sahi ho. Ham Tumhare Saath hain.

    DR. ANWER JAMAL said...

    भाई जान ! ये लोग आपको डरा रहे हैं जबकि डर खुद रहे हैं .

    pawakumar said...

    भाई जान कोण है ये गुस्ताख हमें भी बताओ ! जिसने आपकी शान मैं गुस्ताखी की और आप के ऊपर इतने संगीन इल्जाम लगाये है और आपका ब्लॉग बंद करने तक की धमकी दी!


    भाई जान हम ये हिन्दू और मुस्लिम तो नहीं जानते ! हम तो सिर्फ प्यार की भाषा जाने है...और हम आप से बहुत प्यार करते हैं आप हमारे बड़े भाई और दिशा निर्देशक है!

    हम उस गुस्ताख की तरफ से, आप से माफ़ी मागते है और आपसे गुजारिश करते है की आप आगे ऐसे ही ब्लॉग लिखते रहे !

    आपका छोटा भाई.
    पवन

    kunwarji's said...

    bhai jaan kya koi bhi aapke paksh me nahi tha?aapki is post se to yahi laga!
    ya dutkaarne walo ka hi gaan kiya jaata hai?
    hum pawan kumaae ji se bhi sehmat jaise aap se...

    kunwar ji,