अधिकतर मान्यताओं के अनुसार इस्लाम में संगीत हराम है

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  • Monday, May 10, 2010
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  • Shah Nawaz
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  • अपने ब्लॉग महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar) जी ने एक लेख लिखा जो कि गुजरात के भरूच जिले में चल रहे एक रहत शिविर पर आधारित था.

    "अरे?!!!… मोदी के गुजरात में ऐसा भी होता है? ...... Gujrat Riots, Relief Camp and NGOs in India"

    जिस पर मेरा कमेंट्स था कि :
    "चिपलूनकर साहब, संगीत इस्लाम में हराम है और अगर इस्लामिक शरियत के हिसाब से इकट्ठे लोगो के खून पसीने से कमाए हुए पैसे से किसी की मदद की जाती है तो क्या उस पैसे का प्रयोग ग़ैर-इस्लामी तरीके से हो सकता है? मैं स्वयं भी ज़कात देता हूँ, लेकिन कभी भी ऐसी जगह ज़कात नहीं दे सकता हूँ जहाँ ग़ैर-इस्लामी कार्य होते हों. वैसे मैं तो हमेशा शिक्षण संस्थानों में ही अपनी ज़कात देता हूँ.



    हाँ ज़बरदस्ती टोपी पहनना या दाढ़ी रखवाने बिलकुल ही गलत कार्य है, इसकी निंदा अवश्य ही होनी चाहिए. क्योंकि ऐसे कार्य मनुष्य और प्रभु के प्रेम पर आधारित होते हैं, इस तरह के कार्यों पर ज़बरदस्ती की इजाज़त शरियत कानून में भी नहीं होती है. ऐसा कानून शरियत का नहीं अपितु तालिबान का ही हो सकता है.

    और रही शरियत कानून की बात तो मुसलमान शरियत के तहत ही अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं. बार-बार क्यों यह बात लिख कर कि इन पर शरियत कानून लागु कर दो, आप लोग शरियत कानून का हौव्वा खड़ा करते हैं?
    हमने तो स्वयं अपने ऊपर शरियत कानून लागु कर रखा है. क्या आपको पता भी है कि शरियत कानून क्या है? या सिर्फ तालिबानी कानूनों को शरियत कानून मान कर बैठे हैं?
     
    इस पर सुरेश जी ने दो प्रश्न लिखे:
    @ शाहनवाज़ - आपने कहा कि
    1) "संगीत इस्लाम में हराम है"

    इसे साबित करने के लिये हदीस या कुरान का कोई पैराग्राफ़ बतायें, कि इस्लाम में संगीत क्यों हराम है?, कैसे हराम है? इन बातों की डीटेल्स, मोहम्मद रफ़ी, नौशाद से लेकर एआर रहमान तक सभी मुस्लिम संगीतकारों-गायकों को ध्यान में रखकर दीजिये… या तो यहाँ टिप्पणी करके मेरा (सबका) ज्ञान बढ़ाईये या आपकी अंजुमन पर एक विस्तृत पोस्ट लिखिये…।


    2) आपने कहा कि - "रही शरियत कानून की बात तो मुसलमान शरियत के तहत ही अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं"

     
    क्या दाऊद इब्राहीम, अबू सलेम, अब्दुल करीम तेलगी, अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरु भी शरीयत के अनुसार जीवन-यापन करते हैं? यदि हां तो कैसे और यदि नहीं, तो इन लोगों पर शरीयत के अनुसार सजा मुकर्रर की जाये, क्या आप सहमत हैं?


    मेरे उपरोक्त दोनो "नादान" सवालों के जवाब अवश्य दीजियेगा, आपको न पता हों तो अपने "गुरुजी" से पूछकर ही दीजियेगा, लेकिन पूरे विस्तार से दीजियेगा, ताकि हमें भी तो पता चले।


    इसमें पहली बात तो यह कि गाना इस्लाम में प्रतिबंधित नहीं है, मुसलमान ना`त (मुहम्मद स. की तारीफ़) इत्यादि जैसे गीत गाते हैं. लेकिन कई प्रकार के संगीत है जो कुरान और हदीस (मुहम्मद स. की बताई हुई बातें) के द्वारा निषिद्ध है, जैसे कि मनोरंजन के लिए बजने वाला संगीत. लेकिन "सभी प्रकार के संगीत निषिद्ध हैं" इस विषय पर इस्लामिक विद्वानों की अलग-अलग राय हैं. इसलिए इस विषय पर बहस करना अनुचित है.

    शैख़-अल-इस्लाम इब्न-तय्मियाह (रह.) ने फ़रमाया: "चारों इमामों (सुन्नी इमाम) का नजरिया संगीत के प्रति यह है कि हर तरह के संगीत का यंत्र हराम है. किसी भी इमाम अथवा उनके शिष्यों में संगीत से सम्बंधित मामले में कोई विरोधाभास नहीं है." (अल-मजमू, 11/576).

    अल-अल्बानी (रह.) ने फ़रमाया: "इस्लाम के चारों मज़हब इस बात पर सहमत हैं, कि संगीत का सारे यंत्र हराम हैं. (अल-सहीहः, 1/145).
     
    उपरोक्त उदहारण से यह पता चलता है कि इस्लाम में अधिकतर लोग संगीत को हराम (निषिद्ध) मानते हैं. परन्तु कौन क्या मानता है, यह आस्था का प्रश्न है. आप किसी को भी अच्छी बातें बता तो सकते हैं, परन्तु वह माने अथवा नहीं इसका फैसला तो उक्त व्यक्ति पर ही निर्भर होना चाहिए. मेरा धर्म किसी पर भी ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं देता है. क्योंकि धर्म का रिश्ता आस्था से है और आस्था पर केवल और केवल ह्रदय का ही वश चलता है.

    अगर कोई यह मानता है कि इस्लाम में संगीत हराम है, तो वह अपने खून-पसीने की कमाई में से दी गई ज़कात को ऐसे कार्यों अथवा ऐसी जगह पर लगते हुए नहीं देख सकता है, जहाँ संगीत के प्रयोग जैसे बड़े धार्मिक नियमों का उल्लंघन होता हो.  इसमें एक बात और महत्वपूर्ण है, कि ज़कात और मदद में फर्क होता है. मदद की कोई कम या अधिक सीमा नहीं होती है, जबकि ज़कात अर्थात अपनी बचत में से 2.5 प्रतिशत देना हर एक के लिए आवश्यक होता है. जहाँ मदद किसी को भी कुछ भी देखे बिना दी जा सकती है, वहीँ ज़कात पूरी तरह छान-बीन करके ही दी जाती है, कि वह सही और आवश्यकता की जगह पहुँच रही है अथवा नहीं. इसमें यह भी देखना आवश्यक होता है कि जो व्यक्ति ज़कात मांग रहा है वह इसका हक़दार है भी अथवा नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह खुद अपनी आजीविका चलाने का सामर्थ्य रखता हो तथा जो सामर्थ्य नहीं रखते उनका हक मार रहा हो. ऐसा पाए जाने पर उतने हिस्से की ज़कात दुबारा दिया जाना आवश्यक है.

    अब ऐसे में ज़कात के पैसे से चलने वाले किसी 'शिविर' में अगर कोई व्यक्ति किसी प्रतिबंधित कार्य को करता है तो यह बिलकुल ऐसा है जैसे कोई मांसाहार को अनुचित समझने वाला व्यक्ति गरीब लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करे और भोजन ग्रहण करने वाले लोग मांसाहार की मांग करें और कहें कि हमारे देश में मांसाहार की इजाज़त है. तो क्या उनकी मांग उचित होगी???

    रही बात मौहम्मद रफ़ी अथवा ए. आर. रहमान अथवा इन जैसे गायकों अथवा संगीतकारों की तो में किसी भी मनुष्य के ऊपर उसके कार्यों के द्वारा कमेंट्स नहीं कर सकता हूँ. वैसे भी केवल संगीत का प्रयोग करने भर से कोई इस्लाम से बाहर नहीं हो जाता है. इस्लाम से बाहर केवल वही हो सकता है जो कि ईश्वर को ना माने एवं उसके आदेशो को अपनी अक्ल से गलत ठहराए. और यह भी आवश्यक नहीं कि इंसान खुले-आम ईश्वर को मानने का ऐलान करे. इसलिए दुनिया में कौन काफिर है, यह तो केवल ईश्वर ही जानता है. इसलिए कुरआन में उसने दूसरों को काफ़िर बोलने से मना फ़रमाया है.

    लेकिन किसी भी धार्मिक संस्था को उसके धर्म के अनुरूप राहत शिविर चलाने कि आज्ञा अवश्य होनी चाहिए. मेरा एक मित्र पास के ही एक वैदिक आश्रम में योग शिविर में हिस्सा लेने के लिए गया, परन्तु वहां उसको एक फॉर्म दिया गया जिसमें लिखा था कि वह अपनी इच्छा से 'ॐ' शब्द का उच्चारण तथा सूर्य नमस्कार करेगा, जिस पर उसको एतराज़ हुआ. हालाँकि उपरोक्त आश्रम को हमारी सरकार से भी अनुदान मिलता है, फिर भी मेरी उस मित्र को सलाह यही थी, कि उक्त आश्रम को अपने धर्म के हिसाब से 'योग शिविर' चलने का पूरा हक है. अगर तुम्हे उसके नियम पसंद नहीं आते हैं, तो उसमे हिस्सा लेने की कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु उसका विरोध करना अनुचित है.

    फिर सबसे बड़ी बात तो यह है, कि जिस लोगो का आपने ज़िक्र किया वह एक शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं, जहाँ पैसे की कमी की वजह से बहुत सी आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध नहीं होंगी. ऐसे में अपने थोड़े से पैसो को जीवन के लिए बहुत सी आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करने की जगह टी.वी. जैसी वस्तुओं पर खर्च करना कोई अक्लमंदी का काम नहीं है. पैसे को बचा कर जल्द से जल्द ऐसे शिविरों की जगह अपने स्वयं के खर्च से अपने रहने का इंतजाम करना क्या अधिक अकलमंदी का कार्य नहीं है?

    बात अगर दाऊद इब्राहीम, अबू सलेम, अब्दुल करीम तेलगी, अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरु जैसे अपराधियों एवं मानवता के दुश्मनों के बारे में की जाए है तो इनको अवश्य ही सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए. अगर यह शरियत के तहत ज़िन्दगी बसर करते तो यह इतने जघंन्य अपराध करते ही नहीं. माननिये सुरेश जी, कृपया करके तालिबानी कानूनों को शरियत का कानून मानने की गलती नहीं करें.

    अंत में एक बात कहना अति-आवश्यक है, सुरेश जी मेरे प्यारे वतन के निवासी होने के नाते मेरे भाई हैं तथा मुझसे बड़े होने के नाते उनकी इज्ज़त करना मेरा धर्म है. इसलिए अगर कहीं भी, कुछ भी गलत लिख दिया हो तो क्षमा का प्रार्थी हूँ और चाहता हूँ कि वह अवश्य ही मेरी गलती को मेरे संज्ञान में लाएं.

    -शाहनवाज़ सिद्दीकी

    37 comments:

    बिहारी छोरा said...

    nice

    बिहारी छोरा said...

    nice post

    आनन्‍द पाण्‍डेय said...

    AAPKE VICHAR ACHCHHE HAIN PAR YE VAAD VIVAAD KI LADAAI HAMAARE HI KUCHH BHAIYON NE KHADI KI HAI. JO ISLAAM KO HI HAR TARAH SE SAHI MAANTE HAIN.

    UNKI NAJAR ME SAB KO ISLAAM HI KUBOOL KAR LENA CHAAHIYE.....JABTAK VO SUDHAR NA JAAEN SHAAYAD YE DWAND TAB TAK NAHI RUK PAAEGA

    muk said...

    anand pandey se sehmat

    surat said...

    bhaoo kabhi kachi baat nahin likhte

    zeashan zaidi said...

    बहुत अच्छी पोस्ट!

    mrityunjay kumar rai said...

    nice discussion. i think all religion thought to live peacefully. i respect every religion and think that ISLAM is the purest of all, but some bad elements are tarnishing the good image of islam. like the other religion there is no hypocrisy in ISLAM. this is very simple. i proud that i live in a country where 18 million people follw that sacred religion.

    Madhav
    S/o Mrityunjay Kumar
    http://madhavrai.blogspot.com/
    http://qsba.blogspot.com/

    सुलभ § सतरंगी said...

    आपके पोस्ट की कद्र करता हूँ...
    "उपरोक्त उदहारण से यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम में संगीत हराम है. परन्तु कौन क्या मानता है, यह आस्था का प्रश्न है. आप किसी को भी अच्छी बातें बता तो सकते हैं, परन्तु वह माने अथवा नहीं इसका फैसला तो उक्त व्यक्ति पर ही निर्भर होना चाहिए. मेरा धर्म किसी पर भी ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं देता है. क्योंकि धर्म का रिश्ता आस्था से है और आस्था पर केवल और केवल ह्रदय का ही वश चलता है."

    हम शायद इसलिए भी काफिर कहलाते हैं की, इन पंक्तियों को सच महसूस करते हैं....
    १. " कला संगीत विहीन मनुष्य पशु सामान है",
    २. "वीणा (संगीत वाद्य यंत्र) और पुस्तक (ज्ञान) का सम्बन्ध गहरा होता है.

    मेरा धर्म किसी पर भी ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं देता है. क्योंकि धर्म का रिश्ता आस्था से है और आस्था पर केवल और केवल ह्रदय का ही वश चलता है...... निष्कर्ष यही हुआ, शरीयत क़ानून सच्चा है, उपयोगी है और आस्था का धर्म झूठा अनुपयोगी.

    Shah Nawaz said...

    @ सुलभ § सतरंगी

    सुलभ जी मेरे अनुरूप जो शरियत का कानून ही सच्चा और उपयोगी है, लेकिन मैंने यह कभी भी और कहीं भी नहीं कहा की किसी और का धर्म झुटा और अनुपयोगी है. आपके अनुरूप आपका धर्म सच्चा और उपयोगी हो सकता है, किसी और की नज़र में उसका. अगर हम किसी पर भी अपनी सोच को थोपने की नियत को ठीक कर लेंगे तो मेरे विचार से काफी मसलों का हल हो जाएगा. आपको बेशक यह हक है कि आप बताए कि आपके अनुसार क्या सही है, लेकिन किसी को भी यह हक नहीं कि दुर्भावना पूर्वक दुसरो की आस्था को बुरा कहें.

    Shah Nawaz said...

    "क्योंकि धर्म का रिश्ता आस्था से है और आस्था पर केवल और केवल ह्रदय का ही वश चलता है."

    उपरोक्त बात से मेरा अभिप्राय यह है कि आस्था पर केवल ह्रदय का वश चलता है, वहा ज़बरदस्ती चल ही नहीं सकती है. इसलिए किसी पर भी ज़बरदस्ती आपनी बात को थोपना गलत है.

    Shamshad said...

    Achha article likha hai bhai. orbhi article padhe, kaafi jankariyan hein. Mashallah good work.

    Shamshad said...

    yeh baat apne theek likhi hei ki ज़कात के पैसे से चलने वाले किसी 'शिविर' में अगर कोई व्यक्ति किसी प्रतिबंधित कार्य को करता है तो यह बिलकुल ऐसा है जैसे कोई मांसाहार को अनुचित समझने वाला व्यक्ति गरीब लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करे और भोजन ग्रहण करने वाले लोग मांसाहार की मांग करें और कहें कि हमारे देश में मांसाहार की इजाज़त है. तो क्या उनकी मांग उचित होगी???

    Mashallah.

    Manohar said...

    आजकल हर कोई किसी धर्म अथवा महान व्यक्तित्व की बुराई करके जल्दी से मशहूर होना चाहता है, यह एक बहुत ही बुरा चलन है. अधिकतर लोग दूसरों को बुरा कहते हैं, ऐसे में आपकी बात ठंडी हवा के झोके की तरह लगी.

    Manohar said...

    आपके निम्नलिखित वाक्य पर साधुवाद!

    अंत में एक बात कहना अति-आवश्यक है, सुरेश जी मेरे प्यारे वतन के निवासी होने के नाते मेरे भाई हैं तथा मुझसे बड़े होने के नाते उनकी इज्ज़त करना मेरा धर्म है. इसलिए अगर कहीं भी, कुछ भी गलत लिख दिया हो तो क्षमा का प्रार्थी हूँ और चाहता हूँ कि वह अवश्य ही मेरी गलती को मेरे संज्ञान में लाएं.

    वन्दे ईश्वरम vande ishwaram said...

    अब तक देश के लगभग 2 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं जोकि पाक समर्थित आतंकवाद में मरने वालों की संख्या से कई गुना ज़्यादा हैं। ऐसे ही ग़रीबों-वंचितों के दिलों में निराशा और अवसाद और फिर आक्रोश पैदा होता है। समाज शस्त्र के नियम के अनुसार समस्या से ध्यान हटाने के लिए नेता लोग मनोरंजन के साधन बढ़ा देते हैं लेकिन मनोरंजन के साधन आए दिन ऐसी हिंसक फिल्में दिखाते हैं जिनमें जनता का शोषण करने वाले नेताओं की सामूहिक हत्या को समाधान के रूप में पेश किया जाता है। व्यवस्था और कानून से अपना हक़ और इन्साफ़ मिलते न देखकर हिंसा के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। इनकी समस्या के मूल में जाने के बजाय नेता लोग इसे इसलामी आतंकवाद, नक्सलवाद और राष्ट्रवाद का नाम देकर अपनी राजनीति की रोटियां सेकने लगते हैं। व्यवस्था की रक्षा में फ़ौजी मारे जाते हैं और उनके आश्रित नौकरी और पेट्रोल पम्प आदि पाने के लिए बरसों भटकते रहते हैं। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। देश की व्यवस्था को सम्हालने वाले तो उन लोगों की भी ख़बर नहीं लेते जिन्होंने देश का 70 हज़ार करोड़ रूपया विदेशों में जमा कर रखा है लेकिन सरकार उस मध्यवर्गीय क्लर्क की सैलरी से आयकर काटना नहीं भूलती जिसे अपने बच्चों की फ़ीस देना और उनका इलाज कराना तक भारी होता जा रहा है।
    समस्याएं बहुत सी हैं लेकिन सारी समस्याओं का कारण अव्यवस्था है। यह ‘अव्यवस्था’ केवल इसलिए है कि व्यवस्था को चलाने वाले नेता और उन्हें चुनने वाली देश की जनता अधिकांशतः अपने फ़र्ज़ की अदायगी को लेकर ‘ईमानदार’ नहीं है।
    जब उनके दिल में ‘ईमान’ ही नहीं है तो ईमानदारी आयेगी भी कैसे ?
    ईमान क्या है ?
    ईमान यह है कि आदमी जान ले कि सच्चे मालिक ने उसे इस दुनिया में जो शक्ति और साधन दिए हैं उनमें उसके साथ -साथ दूसरों का भी हक़ मुक़र्रर किया है। इस हक़ को अदा करना ही उसका क़र्ज़ है। फ़र्ज़ भी मुक़र्रर है और उसे अदा करने का तरीक़ा और हद भी। जो भी आदमी इस तरीक़े से हटेगा और अपनी हद से आगे बढ़ेगा। मालिक उस पर और उस जैसों पर अपना दण्ड लागू कर देगा। इक्का दुक्का अपवाद व्यक्तियों को छोड़ दीजिए तो आज हरेक आदमी बैचेनी और दहशत में जी रहा है। हरेक को अपनी सलामती ख़तरे में नज़र आ रही है।
    सलामती केवल इस्लाम दे सकता है
    लेकिन कब ?
    सिर्फ़ तब जबकि इसे सिर्फ़ मुसलमानों का मत न समझा जाए बल्कि इसे अपने मालिक द्वारा अवतरित धर्म समझकर अपनाया जाए। इसके लिए सभी को पक्षपात और संकीर्णता से ऊपर उठना होगा और तभी हम अजेय भारत का निर्माण कर सकेंगे जो सारे विश्व को शांति और कल्याण का मार्ग दिखाएगा और सचमुच विश्व गुरू कहलायेगा।

    विश्‍व गौरव said...

    nice post

    विश्‍व गौरव said...

    अल-अल्बानी (रह.) ने फ़रमाया: "इस्लाम के चारों मज़हब इस बात पर सहमत हैं, कि संगीत का सारे यंत्र हराम हैं. (अल-सहीहः, 1/145).

    इस्‍लाम एक धर्म है उसमें चार धर्म कहां से आये आपको मजहब के स्‍थान पर विचार या मसलक लिखना चाहिये था, वह चार भाई हैं जो अपने अपने तरीके से ईश्‍वर को खुश करना चाहते हैं

    Dr. Ayaz ahmad said...

    नाइस पोस्ट

    Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

    आपके अनुरूप आपका धर्म सच्चा और उपयोगी हो सकता है, किसी और की नज़र में उसका.

    सारे फसाद का जड़ तो यही है मेरे भाई ... की हर कोई अपने धर्म को बेहतर मानता है और उसमे अगर कोई गलत बात हो तो उसे मानने से इंकार करता है ... हिंदू कहता है की गीता, वेद, पुराण ही सबकुछ है और चूँकि उसमे कुछ लिखा हुआ है तो वो सही है ... मुसलमान कहता है की कुरान या हदीस में कुछ लिखा है तो वो सही है ... ईसाई कहता है की जो बिबले में लिखा है वही सही है ... भाईसाब हम सबके पास अपना दिमाग है ... हम ये सोच सकते हैं, जान सकते हैं, समझ सकते हैं की क्या सही है और क्या गलत, फिर इन किताबों की ज़रूरत क्या है?
    मैं इस धर्म का हूँ, इसलिए इस धर्म की किताब को मैं तो मानूंगा, भले ही इसमें कोई गलत बात लिखी हो, लेकिन मैं ये नहीं मानूंगा की यह गलत है, सिर्फ इसलिए क्यूंकि ये मेरे धर्म की किताब है .... वाह क्या लाजिक है जी ... अरे हाँ मैं तो भूल ही गया था ... मज़हब में लाजिक नहीं आस्था देखी जाती है ....
    आपके अनुसार इस्लाम में सभी वाद्ययंत्र, मौसिकी हराम है ... जबकि मैं ये देखता हूँ कि भारत के लगभग सभी मस्जिदों में नमाज काफी सुर ताकल के साथ पढ़ा जाता है ... तो आप नमाज पढ़ने के लिए मौसिकी का इस्तमाल कर सकते हैं पर अपनी दिल कि बात रखने के लिए नहीं कर सकते हैं ... यहाँ शरिया आड़े आ जाता है ... ये तालिबानी सोच नहीं है क्या? बस फर्क ये है कि आप अपनी इस सोच को दूसरों पर ज़बरदस्ती नहीं थोप रहे हैं, या फिर चाहे भी तो अभी और यहाँ नहीं थोप सकते हैं, और वाहन अफगानिस्तान में तालिबान ये कर सकता है, कर रहा है, क्यूंकि उनके पास वो ताकत है ...

    Shah Nawaz said...

    @ Indranil Bhattacharjee ........."सैल"

    मित्र, मैंने तो केवल वाद्ययंत्रों के बारे में बताया है, सुरों की बात तो मैंने कहीं की ही नहीं है.

    अन्तर सोहिल said...

    आदरणीय शाह नवाज जी
    आपने जकात के बारे में जानकारी दी, शुक्रिया
    और जिस तरह से सुरेश जी के प्रश्नों का समुचित समाधान किया। बहुत अच्छा लगा।
    बहुत बढिया पोस्ट

    प्रणाम

    Anurag Geete said...

    शाहनवाज़ जी सिर्फ उतुस्कतावश पूछ रहा हु, इस्लाम में संगीत हराम क्यों है? कुछ तो तर्क संगत वजह होगी इसकी.

    पी.सी.गोदियाल said...

    किसी ने ये नहीं पुछा कि पैसा कमाने के लिए सारे ही मुसलमान फ़िल्म इंडस्ट्री, जिसका कि मूल ही संगीत है, से जुड़े है, वो हराम नहीं है ?

    Shah Nawaz said...

    गोदियाल जी,

    यहाँ पर हराम से तात्पर्य वह कार्य है जिसकी आज्ञा नहीं है. लेकिन जैसा की मैंने पहले भी बताया कि संगीत के बारें में अलग-अलग राय भी हैं, कुछ लोग ईश्वरीय भजन इत्यादि के लिए संगीत को गलत नहीं मानते हैं. इस प्रकार से जो कार्य करना सही नहीं है, उससे उत्त्पन्न आय भी सही नहीं होगी.

    कैरियर्स वर्ल्ड said...

    nice post

    Shah Nawaz said...

    @ Anurag Geete

    अनुराग जी, आप इसके लिए निम्नलिखित वेब पेज पढ़ सकते हैं.

    http://www.inter-islam.org/Prohibitions/Mansy_music.htm

    ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

    संयमित तरीके से उचित जानकारी।
    --------
    कौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
    पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

    zeashan zaidi said...

    म्यूजिक घातक भी हो सकती है. इस बारे में एक विचार यहाँ पर है, फिक्शन की शक्ल में.

    पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

    @ शाहनवाज जी,
    आपका कहना है कि "किसी को भी यह हक नहीं कि दुर्भावना पूर्वक दुसरो की आस्था को बुरा कहें"....आपके विचार बहुत नेक लगे...लेकिन एक बात जो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, वो ये कि डाक्टर जमाल जो अपने ब्लअग पर हिन्दु धर्म, उनके देवी-देवताओं, उनकी परम्पराओं को लेकर ऊलजलूल बकवास लिखता रहता है...क्या इस्लाम उसकी इजाजत देता है?....क्या आप उसे सही मानते हैं?....यदि आप सचमुच में उसे गलत मानते हैं तो क्या आपने कभी उनके ब्लाग पर टिप्पणी के जरिए उन्हे इन कुकृ्त्यों के लिए रोकने का प्रयास किया या फिर ये आपका भी ये सारा ज्ञान सिर्फ दूसरों की नजर में खुद को धार्मिक विद्वान, नेकनीयत सिद्ध करने तक ही है? आप लोग जो कहते हैं, वो बात व्यवहारिकता में क्यों नहीं दिखाई देती? कथनी और करनी का ये विरोधाभास किसलिए?...
    आशा करता हूँ कि आप इस विषय में अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगें......

    Anurag Geete said...

    शाहनवाज़ जी, आपके द्वारा दिए गए लिंक पर जा कर हमने वह लेख पड़ा और समझ यह आया की वह एक खास तरह के संगीत की बात कर रहे है, जो आपके ऊपर गलत असर डाल सकता है, जिस तरह हर वस्तु के दो पहलु होते है उसी तरह संगीत भी अच्छा और बुरा हो सकता है, संगीत सुनने वाले भी अपनी समझ का इस्तेमाल कर के ही संगीत सुनते है, विज्ञान भी संगीत के सकारात्मक प्रभाव को इलाज के लिए प्रयोग करता आया है जिसे हम म्यूजिक थेरेपी कहते है, संगीत से जुड़े कई महान कलाकार मुस्लमान हुए है और उनका योगदान बहुत अमूल्य रहा है. अच्छे संगीत का प्रभाव तो दूध देने वाले पशु और पेड़ पौधों पर भी देखा गया है. शांत और मधुर संगीत पुरे शारीर और आत्मा तक को तृप्त करता है.. मुगलों से लेकर दुनिया के कई मुस्लिम शासको के खास लोगो में कई गायक और संगीतकार होते रहे है, मुग़ल और कई मुस्लिम शासक जो भारत में आये वह कट्टर मुस्लिम होने के बावजूद संगीतकरो को न सिर्फ प्रश्रय देते थे बल्कि उन्हें पुरस्कृत भी करते थे, सूफी संगीत का बोलबाला पूरी दुनिया में है जो पूरी तरह मुस्लिम संगीत मन गया है... आपकी इस बारे में क्या राय है..

    Shah Nawaz said...

    @ पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    सबसे पहले तो मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

    जैसा कि आपने प्रश्न किया, तो इस पर मेरा पक्ष यही है कि मैं न तो किसी कि धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाने की कोशिश करता हूँ और ना ही ऐसे किसी कार्य को उचित समझता हूँ. ना तो यह मेरे संस्कारों में है और ना ही मेरा धर्म इसकी इजाज़त देता है.

    हाँ अगर आप बिना दुर्भावना रखे समाज में फैली किसी कुरीति के विरुद्ध लिखते हैं तो अलग बात है. हालाँकि उसका मकसद भी लोगो को शिक्षित करना होना चाहिए ना कि धर्म विशेष को नीचा दिखाना. और इसमें भी किसी की भावनाएं आहत ना हो इसका ध्यान अवश्य ही रखा जाना चाहिए.

    मैं चाहता हूँ कि आप डॉ. अनवर जमाल तथा फिरदौस बहन को संबोधित करते हुए लिखे गए लेख "डॉ. अनवर जमाल साहब अब बहुत हो गया" को अवश्य पढ़े. इसके लिए निम्नलिखित लिंक को खोलें:

    http://shnawaz.blogspot.com/2010/04/blog-post_19.html

    Anurag Geete said...

    तबले के अविष्कारक के रूप में आमिर खुसरो को जाना जाता है ... मेरी जानकारी में वह भी मुस्लमान ही थे.

    Shah Nawaz said...

    अनुराग जी,

    मैं मानता हूँ कि और चीजों का तरह ही संगीत के भी अच्छे एवं बुरे परिणाम हो सकते हैं. इसमें एक बात तो यह कि कोई आम इंसान इन प्रभावों का पता नहीं लगा सकता है. इसलिए अज्ञानता की वजह से भी परेशानी हो सकती है. दूसरी बात यह कि रिसर्च के अनुसार संगीत के असर से मन के अन्दर योनेछा अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे व्यभिचार तथा बलात्कार जैसी आदतें बढती है. आजकल के माहौल को देखकर संगीत के इस असर पर विश्वास भी होता है.

    एक बात यह भी हो सकती है कि संगीत में इंसान अक्सर खो जाता है और ऐसे में ईश्वर की याद को भी भुला बैठता है. और ऐसे कार्यों को इस्लाम में हतोत्साहित किया गया है.

    वैसे मैंने पहले भी कहा था की संगीत पर इस्लामिक विद्वानों की अलग-अलग राय हैं, इसलिए इस विषय पर बहस करना अनुचित है. यह भी ज़रूरी नहीं कि सभी मुस्लिम उपरोक्त राय का पालन करते हैं जो कि मैंने ऊपर बताई.

    Anjum Sheikh said...

    Bahut hi Umda post hai Shahnawaz bhai!

    asad ali said...

    bhai aapka blog padhker acha laga. aapke is blog se sabhi bhaiyo ke dilo mai ek nayi kiran jaagrut hoti hai..

    Vidhya Sharma said...

    Mr. Shah Nawaz,
    First of all, very nice post.
    As you said because of music, human forgot the god, I don't want to do any deep conservation but my thinking is that and this is not only mine that if the music is purely dedicated to the god, as we Hindus do, then how it could be bad.Our bhajans, stutis etc. are forms of Bhakti, it is the part of Navdha Bhakti means God can be remembered by Nine ways.Please Search for Navdha Bhakti.Everything is created by god and all these things can
    be used for worship the god and we also offer ourselves to the god.Means, do whatever you do, but include god with that, because in our Indian culture, work is also said Worship.In this world, including us humans, every goodness is the part,form of the god and resembles god.He is everywhere.So, I think god can't be bound to any fixed path or place.And you are absolutely right, No one can be forced to do this or that.It is on him/her to remember god in his/her heart.So, it is not necessary that every hindu goes to temple, does worship, does Mala or does whatever.If he/she is theist or atheist, religion is that doesn't get him/her out, but shows good way to him.So, in our Indian culture, if anyone is Nastik,then he or she are same acceptable on the basis of their Virtues.
    Remember Swami Dayanand Saraswati who left his worship of lord Shiva because he didn't believe, It;s okay, but Swami Saraswati is the greatest people of the Sanatan Religion.Do you know why?Because God is the biggest truth in the world and for knowing the everyone is free to find his own way.Because god is in our heart.God lead us, either we believe on god or not,but doesn't give up if we follow good,we try to think what is good or bad on the basis on humanity.Swami dayanand did not believe on what he was told, but he searched for what his heart says.His quest was for the truth and he found it.So, no matter anyone is Nastik or Astik, but if he/she is good, follows the truth, then he is same loveable for good.There is just need to the eyes to see the god.
    Thank you.

    aryan singh said...

    मै बी अपनी बात रखना चाहूँगा।।।इस्लाम में जन्नत का हक़दार मुस्लिम ही कई है।।।गैर मुस्लिम कितना बी नेक क्यों न हो वो जहन्नुम में जायेगा।।।।भगत सिंह।।सुखदेव राजगुरु ग़ांधी आज़ाद और दूसरे धर्मो के सभी नेक लोग और बॉर्डर पर देश के लिए अपनी जान देना वाले सभी गैर मुस्लिम जहन्नुम में और सभी नेक मुस्लिम जन्नत में और बुरे मुस्लिम जहन्नुम में अपनी सजा काटकर नूर वाले पानी से पाक होकर जन्नत में 72 हूरो के साथ मजे करेगे।।।हर ईमान वालो को 100 मर्दों की ताक़त होगी की वो सभी हूरो के साथ मजे कर सके।।।।।।ये कहा का इन्साफ हे अल्लाह का