बी एन शर्मा जी (भंडाफोडू) के सवालों का जवाब

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  • Wednesday, June 23, 2010
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  • Shah Nawaz
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  • बी एन शर्मा जी, आपने लिखा कि अल्लाह के इतना करीब होते हुए भी उसने मुहम्मद (स.) को केवल एक ही लड़का दिया और वह भी कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त हो गया.

    शर्मा जी, क्या ईश्वर के करीब होने और लड़का ना होने का कोई ताल्लुक है? क्या आपकी सोच यह है कि लड़का होना इतनी अच्छी बात है कि जो ईश्वर के करीब होगा उसके घर में लड़कों की भरमार होगी और जो ईश्वर से दूर होगा उसे ईश्वर लड़कियां देगा? आपकी इस सोच पर मुझे गुस्सा नहीं अपितु दया आ रही है. वैसे आपको बताता चलूँ कि मेरे खुदा ने मुझे (माशाल्लाह) दो-दो प्यारी-प्यारी बेटियां दी हैं और यह उस परम-परमेश्वर का मुझपर एहसान है.

    आपने मुहम्मद (स.) के वंशजो पर दु:ख की और उनके शहीद होने पर सवाल उठाया, क्योंकि आपका मानना है कि अच्छे लोगों को दुःख नहीं मिलते जबकि हमारा मानना है कि ईश्वर हमेशा अच्छे लोगों को ही दुःख देखर उनकी परीक्षा लेता है कि वह इस हाल में भी ईश्वर का शुक्र अता करते हैं कि नहीं. वैसे परीक्षा उसी की ली जाती है जो इस काबिल होता है और दुःख: झेलकर भी ईश्वर का शुक्र अता करने वाले विरले ही होते हैं. और ऐसे ही विरलों का ज़िक्र आपने अपने लेख में किया है, जिसपर मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ.

    आप जानना चाहते हैं कि ईश्वर ने अपने रसूल (संदेशवाहक) के वंशजो को शहीद होने से क्यों नहीं बचाया? आपके कहने का मतलब शायद यह है कि अगर कोई परम गुरु मुहम्मद (स.) जैसे महापुरुष के परिवार का सदस्य या उनका वंशज है तो ईश्वर को उनके लिए पृथ्वी के नियम बदल देने चाहिए? जबकि स्वयं ईश्वर कहता है कि वह मनुष्य पर नहीं अपितु उसके कार्यों पर नज़र डालकर फैसला करता है. रही बात युद्ध में मदद की तो उस ज़माने में ही नहीं बल्कि आज भी ईश्वर सत्य के साथ होता है. और अपने लोगों और अपनी धरती की रक्षा करने वालों की मदद करता है. शायद तुम्हे याद नहीं कि उसकी मदद से ही हमने पाकिस्तान को 4 बार युद्ध के मैदान में धुल चटाई है.

    शर्मा जी, आपकी यह बात बिलकुल सही है कि किसी दुसरे मज़हब को मानने वाले अथवा शायरी करने वाले नर्क के वासी नहीं हो सकते हैं. नर्क में जाने का यह कोई कारण है ही नहीं, बल्कि ईश्वर ने कुरआन में कहा कि हमेशा हक का साथ दो चाहे हक बात कोई तुम्हारा दुश्मन ही क्यों ना करे. फिर शायरी तो बड़े-बड़े दीनदार लोगो ने की हैं. आपसे किसने कह दिया कि वह दोजखी हो जाएगा? हाँ अगर कोई ईश्वर अथवा उसके विधान की खुलेआम शब्दों अथवा शायरी के द्वारा खिलाफत करे और मौत तक उसको अपनी गलतियों का पछतावा ना हो तो अवश्य हो सकता है.

    आपकी शिकायत है कि मुसलमान मुहम्मद (स.) के वंशजो के कातिलों को रज़िअल्लाहू कह कर आदर करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, जिन पर यह बात साबित है उनका आदार नहीं किया जाता है, बल्कि उन पर लानत भेजी जाती है, जैसा की यजीद. रही बात 'रज़िअल्लाहू' कहने की, तो ऐसा मुहम्मद (स.) के उन साथियों को कहा जाता है जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ईश्वर के आखिरी संदेशवाहक और मेरे परम गुरु मुहम्मद (स.) को ईमान की हालत में देखा और ईमान की हालत में ही मौत हो गई. अब आप ही बताइए किसी को कैसे पता कि किसकी मौत ईमान की हालत में हुई और किसकी नहीं? यह तो केवल ईश्वर ही जानता है. रही बात इमान की तो अगर किसी ने पूरी दुनिया के इंसानों को भी एक साथ क़त्ल किया हो, तथा उसे अपनी ज़िन्दगी में ही अपनी गलती का एहसास हो गया हो और उसने ईश्वर से अपनी गलतियों की माफ़ी मांग ली हो तो ईश्वर रहीम है और उसका वादा है कि वह उसके गुनाह को माफ़ कर देगा. हाँ यह बात अवश्य है कि जिन लोग के हक को मारा अर्थात जिनको क़त्ल किया वह लोग चाहेंगे तो अवश्य ही अपना हक अल्लाह (ईश्वर) की बारगाह में इन्साफ के दिन मांग ले लेंगे. अर्थात दुनिया में एक-दुसरे के हक माफ़ नहीं होंगे.

    मसलन अगर किसी ने किसी से पैसे उधार लिए और नहीं लौटाए तो इन्साफ के दिन उसके बदले में उसे अपने सद्कर्म पैसे के बदले में देने होंगे. इसमें भी अगर उसको दुनिया में ही अपनी गलती का एहसास होगा गया लेकिन पैसे लौटने के लिए उसके पास बचे नहीं तो वह जिससे पैसे उधर लिए थे उससे वह पैसे माफ़ करने की बार-बार गुज़ारिश कर सकता है. और अगर उसने ऐसा किया और पैसे ना होने की वजह से नहीं लौटा पाया तो इन्साफ के दिन ईश्वर स्वयं अपनी तरफ से उधार देने वाले के दफ्तर में पैसे के बदले अच्छाइयां भर देगा.

    - शाहनवाज़ सिद्दीकी

    62 comments:

    नईम said...

    शर्मा जी, क्या ईश्वर के करीब होने और लड़का ना होने का कोई ताल्लुक है? क्या आपकी सोच यह है कि लड़का होना इतनी अच्छी बात है कि जो ईश्वर के करीब होगा उसके घर में लड़कों की भरमार होगी और जो ईश्वर से दूर होगा उसे ईश्वर लड़कियां देगा? आपकी इस सोच पर मुझे गुस्सा नहीं अपितु दया आ रही है.

    नईम said...

    शाहनवाज़ साहब बहुत अच्छा !! माशा अल्लाह आपने खूब समझाया है.

    saif said...

    PLZ SHARMA JEE DHYAAN DEN :आपकी शिकायत है कि मुसलमान मुहम्मद (स.) के वंशजो को रज़िअल्लाहू कह कर आदर करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, जिन पर यह बात साबित है उनका आदार नहीं किया जाता है, जैसा की यजीद. रही बात 'रज़िअल्लाहू' कहने की, तो ऐसा मुहम्मद (स.) के उन साथियों को कहा जाता है जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ईश्वर के आखिरी संदेशवाहक और मेरे परम गुरु मुहम्मद (स.) को ईमान की हालत में देखा और ईमान की हालत में ही मौत हो गई.

    saif said...

    SHARMA JI DEKHIYE
    आपने मुहम्मद (स.) के वंशजो पर दु:ख की और उनके शहीद होने पर सवाल उठाया, क्योंकि आपका मानना है कि अच्छे लोगों को दुःख नहीं मिलते जबकि हमारा मानना है कि ईश्वर हमेशा अच्छे लोगों को ही दुःख देखर उनकी परीक्षा लेता है कि वह इस हाल में भी ईश्वर का शुक्र अता करते हैं कि नहीं. वैसे परीक्षा उसी की ली जाती है जो इस काबिल होता है और दुःख: झेलकर भी ईश्वर का शुक्र अता करने वाले विरले ही होते हैं. और ऐसे ही विरलों का ज़िक्र आपने अपने लेख में किया है, जिसपर मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ

    T.M.Zeyaul Haque said...

    KAHAN HAIN SHARMA MAHARAAJ आप जानना चाहते हैं कि ईश्वर ने अपने रसूल (संदेशवाहक) के वंशजो को शहीद होने से क्यों नहीं बचाया? आपके कहने का मतलब शायद यह है कि अगर कोई परम गुरु मुहम्मद (स.) जैसे महापुरुष के परिवार का सदस्य या उनका वंशज है तो ईश्वर को उनके लिए पृथ्वी के नियम बदल देने चाहिए? जबकि स्वयं ईश्वर कहता है कि वह मनुष्य पर नहीं अपितु उसके कार्यों पर नज़र डालकर फैसला करता है. रही बात युद्ध में मदद की तो उस ज़माने में ही नहीं बल्कि आज भी ईश्वर सत्य के साथ होता है. और अपने लोगों और अपनी धरती की रक्षा करने वालों की मदद करता है. शायद तुम्हे याद नहीं कि उसकी मदद से ही हमने पाकिस्तान को 4 बार युद्ध के मैदान में धुल चटाई है

    T.M.Zeyaul Haque said...

    AUR HAAN SHARMA JI IDHAR BHI ZARA PADHEN ही बात इमान की तो अगर किसी ने पूरी दुनिया के इंसानों को भी एक साथ क़त्ल किया हो, तथा उसे अपनी ज़िन्दगी में ही अपनी गलती का एहसास हो गया हो और उसने ईश्वर से अपनी गलतियों की माफ़ी मांग ली हो तो ईश्वर रहीम है और उसका वादा है कि वह उसके गुनाह को माफ़ कर देगा. हाँ यह बात अवश्य है कि जिन लोग के हक को मारा अर्थात जिनको क़त्ल किया वह लोग चाहेंगे तो अवश्य ही अपना हक अल्लाह (ईश्वर) की बारगाह में इन्साफ के दिन मांग ले लेंगे. अर्थात दुनिया में एक-दुसरे के हक माफ़ नहीं होंगे.

    शेरघाटी said...

    मैं बेटियों को बेटों से कमतर समझता ही नहीं अगर किसी की ऐसी सोच है तो वह हद दर्जे का अमानवीय है.

    शेरघाटी said...

    हमारे पिता जी कहा करते हैं कि बेटियों की परवरिश करना सब से उत्तम है.यानी अफज़ल है.

    शहरोज़ said...

    मैं बेटी विरोधियों को नारी विरोधी समझता हूँ.

    शहरोज़ said...

    लड़कियों को हकीर न समझो.लड़कों को कभी उसकी तुलना में प्राथमिकता न दो.भैया अपन को तो यही शिक्षा मिली है.

    talib د عا ؤ ں کا طا لب said...

    पैगम्बर मुहम्मद स. के पहले अरब में लड़कियों को उनके जन्म होते ही जिंदा गाड़ दिए जाने जैसी प्रथा थी लेकिन इस्लाम के आने के बाद ऐसी कुप्रथाओं को ही लोगों ने जिंदा गाड़ दिया.समझे शर्मा साहब !

    talib د عا ؤ ں کا طا لب said...

    और ये अल्लाह यानी परम परमेश्वर की ही मंशा रही होगी कि हुजुर को बेटियाँ हुईं और जीवित रहीं,ताकि लोगों के सामने बेटियों की परवरिश और उनके सम्मान का नमूना लोग हुजुर के बहाने देख सकें.और नारी का सम्मान बढे,ये खुदा की ही मसलेहत होगी.

    zeashan zaidi said...

    शर्मा जी को यह गलत खबर मिली है की शायर जहन्नुम में जाते हैं. हकीकत तो ये है की पूरा कुरआन ही शायरी की भाषा में है.

    DR. ANWER JAMAL said...

    ye jaan bujh kar bawle bante hain kyunki apne dharm ko aisa bigad kar baith gaye ki us par chal nahin sakte aur Islam ko apnane me apni tauhin mante hain .

    zeashan zaidi said...

    जिन पर ज़ुल्म की बात साबित है उनका आदर नहीं किया जाता है, जैसा की यजीद.

    DR. ANWER JAMAL said...

    बच्चा मासूम होता है। लोग उसे फ़रिश्ते की मानिन्द मानते हैं। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते जब तक कि तुम बच्चों की भांति न हो जाओ। बच्चे अबोध और मासूम होते हैं। शिकवे शिकायत और रंजिंशे देर तक उनके मन में नहीं ठहरतीं। साथ खेलते हैं तो लड़ भी लेते हैं और छीन झपट भी कर लेते हैं लेकिन बच्चे बदनीयत नहीं होते।
    पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने भी बच्चों को जन्नत का फूल फ़रमाया है।
    हिन्दू धर्मग्रंथों में भी बच्चों की उपमा किसी अच्छी चीज़ से ही दी गयी होगी।
    इसके बावजूद लोग मानते हैं कि बच्चे बीमार इसलिये पड़ते हैं क्योंकि वे पिछले जन्म में कुछ पाप करके आये हैं।
    हम तो बच्चों को मासूम और निष्पाप मानते हैं, जो कोई उन्हें पापी मानता है वह अपनी मान्यता पर विचार करे।
    ... और शीघ्र ही मैं बाप बनने वाला हूं एक ऐसे बच्चे का जो पिछले जन्म का पापी नहीं है क्योंकि इस धरती पर उसका किसी भी योनि में कोई जन्म नहीं हुआ है। वह एकदम फ़्रेश आत्मा है। सीधे आत्मालोक से गर्भ में आयी और अब हमारी गोद में खेलेगी।
    जो लोग दुआ करते हैं, उनसे दुआ की दरख्वास्त है।
    http://vedquran.blogspot.com/2010/06/blog-post.html

    DR. ANWER JAMAL said...

    हम तो बच्चों को मासूम और निष्पाप मानते हैं, जो कोई उन्हें पापी मानता है वह अपनी मान्यता पर विचार करे।

    Voice Of The People said...

    शाहनवाज़ सिद्दीकी साहेब बेहतरीन जवाब. बी एन शर्मा जी जी की एक ही मुश्किल है, वोह इस्लाम के बारे में सही इल्म रखते हैं और समझ यह रहे हैं की इल्म पूरा है लिखते अच्छा हैं, लेकिन मकसद गलत. इसी वजह से लेख़ में इन्साफ नहीं कर पते.

    Voice Of The People said...

    जिस औरत को यह नेमत नहीं जहमत समझ रहे हैं, वोह मां भी है सबकी. यह मर्दों से ही नस्ल चलती है, ढोंग है, औरत से भी नस्ल चलती है और इस्लाम में इसकी मिसाल है, रसूल इ खुदा(स.अ० इ बेटी फातिमा ज़हर की नस्ल. इस्लाम में औरत का दर्जा बलंद है. http://aqyouth.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html

    सुज्ञ said...

    यहां भी आपकी बात में विरोधाभास हैं,
    जिन्होने स्वयं को अल्लाह की राह में समर्पित कर दिया है,जो कलमा मात्र पढते ही नहिं, रोम रोम में बसा लेते हैं,उनकी अल्लाह और भी ज्यादा परिक्षा लेते है?पूर्ण समर्पण के बाद भी परिक्षाएं शेष? एक सांस तक अल्लाह की आज्ञानुसार ले,और रत्तिभर भी नाफ़र्मानी न करे फिर भी टेस्ट बाक़ी?
    और जिस धरती के अधिकत्तर वाशिंदे,अल्लाह की राह पर नहीं है,उनकी अल्लाह मदद करके पाकिस्तान को चार बार धूल चटानें में साथ देतें है?
    देखिये आप ही कह्ते है “आपके कहने का मतलब शायद यह है कि अगर कोई अल्लाह (ईश्वर) के रसूल (संदेशवाहक) के परिवार का सदस्य है या उनका वंशज है तो उसको पृथ्वी के नियम बदल देने चाहिए??? जबकि ईश्वर स्वयं कुरआन में कहता है कि वह मनुष्य को नहीं अपितु उसके कार्यों पर नज़र डालकर फैसला करता है और करेगा. रही बात युद्ध में मदद की तो उस ज़माने में ही नहीं बल्कि आज भी ईश्वर सत्य के साथ होता है. और अपने लोगों और अपनी धरती की रक्षा करने वालों की मदद करता है. शायद तुम्हे याद नहीं कि उसकी मदद से ही हमने पाकिस्तान को 4 बार युद्ध के मैदान में धुल चटाई है.”
    और देखिये कि आपने क्या कर दिया:--
    “वह मनुष्य को नहीं अपितु उसके कार्यों पर नज़र डालकर फैसला करता है और करेगा”
    क्या इंगित कर रहे है,इन वंशजो के कार्य खुदा की राह अनुसार नहिं थे? वे तो सब सच्चे मोमिन थे,

    “ईश्वर सत्य के साथ होता है”
    ये वंशज सत्य के साथ नहिं थे?
    आपके तर्को पर आगे सोचना भी मेरे लिये मुश्किल है।

    Shah Nawaz said...

    @ सुज्ञ
    यहां भी आपकी बात में विरोधाभास हैं, जिन्होने स्वयं को अल्लाह की राह में समर्पित कर दिया है,जो कलमा मात्र पढते ही नहिं, रोम रोम में बसा लेते हैं,उनकी अल्लाह और भी ज्यादा परिक्षा लेते है? पूर्ण समर्पण के बाद भी परिक्षाएं शेष? एक सांस तक अल्लाह की आज्ञानुसार ले,और रत्तिभर भी नाफ़र्मानी न करे फिर भी टेस्ट बाक़ी?

    ईश्वर स्वयं जानता है कि किस के ह्रदय की गहराई में क्या है, उसे अपने लिए परीक्षा लेने की ज़रूरत नहीं है. परीक्षा वह इसलिए लेता है कि कोई उसपर यह आरोप या आक्षेप न लगा सके कि उसे तो मौका ही नहीं मिला, वर्ना वह भी अवश्य उसके बताये हुए रस्ते पर चलता.

    किसी ऐसे शिक्षक के बारे में आपकी क्या राय है जो किसी शिक्षार्थी को केवल अपने अनुभव अथवा जानकारी के चलते सबसे बेहतर शिक्षार्थी मानते हुए परीक्षा मैं बैठने ही ना दे और उत्तीर्ण कर दे. क्या यह दुसरे विद्यार्थियों के साथ इन्साफ होगा? और क्या यह स्वयं उस विद्यार्थी के साथ इन्साफ होगा?

    ईश्वर ने वादा किया है कि वह "इन्साफ के दिन" किसी के भी साथ नाइंसाफी नहीं करेगा.

    इसमें एक बात यह भी है कि परीक्षा केवल पास होने के लिए ही नहीं होती हैं, बल्कि अच्छे से अच्छे दर्जे (Grade) से पास होने के लिए भी होती हैं. और दर्जे का निर्धारण परीक्षा की बाद ही हो सकता है.

    Shah Nawaz said...

    और जिस धरती के अधिकत्तर वाशिंदे,अल्लाह की राह पर नहीं है,उनकी अल्लाह मदद करके पाकिस्तान को चार बार धूल चटानें में साथ देतें है?

    बात यहाँ अल्लाह की राह की नहीं अपितु हक की है. (और आपसे किसने कह दिया की हिंदुस्तान में लोग अल्लाह की राह पर नहीं हैं, श्रीमान मेरे मुल्क के बाशिंदे पकिस्तान से कहीं अधिक तादाद में उसकी राह पर हैं.) पाकिस्तान ने हमारे मुल्क की ज़मीन पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा करने की नापाक कोशिश की इसलिए अल्लाह ने उसका साथ नहीं दिया.

    Shah Nawaz said...

    क्या इंगित कर रहे है,इन वंशजो के कार्य खुदा की राह अनुसार नहिं थे? वे तो सब सच्चे मोमिन थे,

    बेशक मोमिन हैं लेकिन इस दुनिया के बाशिंदे भी हैं. और इस दुनिया के लिए ईश्वर का नियम है कि जो जैसी परीक्षा के काबिल है वह वैसी ही परीक्षा में बैठेगा. आप जानते हैं इस्लाम में शहादत का दर्जा बहुत अधिक ऊपर है.

    मैंने कब कहा कि वह खुदा की राह पर नहीं थे, नाउज़ुबिल्लाह. इस दुनिया में मुझे अल्लाह और उसके नबी (स.) के बाद आप (स.) के वंशजो से ही सबसे अधिक मुहब्बत है और इंशाल्लाह रहेगी. हसन-हुसैन (र.) जैसे वीरों ने ही तो शहादत देकर इस्लाम मज़हब का नाम रोशन किया है. मेरे कथन को सही परिप्रेक्ष में पढ़े, अन्यथा ना लें तो बेहतर है.

    ये वंशज सत्य के साथ नहिं थे?

    बेशक सत्य के साथ थे.

    युद्ध में मदद की बात मैंने बी एन शर्मा जी के उस कथन के जवाब में कहा था जिसमे उन्होंने कहा था कि "युद्ध के समय अल्लाह ने मुहम्मद की सहायता के लिए लाखों फ़रिश्ते भेज दिए थे. जिस से मुहम्मद काफिरों से जीत पाए थे"

    इस पर मैंने लिखा था कि:-

    "रही बात युद्ध में मदद की तो उस ज़माने में ही नहीं बल्कि आज भी ईश्वर सत्य के साथ होता है और अपने लोगों और अपनी धरती की रक्षा करने वालों की मदद करता है"

    Dr. Ayaz ahmad said...

    शर्मा जी की पोस्ट से साबित हो गया कि हिंदू नारी को बेचारी क्यो कहा गया है क्योकि शर्मा जी खुद लड़के को लड़की से अच्छा मानते है जिसका इजहार भी उन्होने अपनी पोस्ट बखूबी कर दिया है ।

    Dr. Ayaz ahmad said...

    nice post

    सुज्ञ said...
    This comment has been removed by the author.
    सुज्ञ said...

    शाहनवाज साहब,

    आपने एक टिप्पनी में कहा था:-
    “अगर आपको लगता है की कहीं मैंने बातों को घुमाया फिराया है तो कृपया मेरे संज्ञान में लाइए. मैं अवश्य ही अपनी गलती को स्वीकार करूँगा………॥
    पहले यह स्पष्ट कर दुं, कि मैं बी एन शर्मा जी की पैरवी करने के लिये यहां नहिं हुं,

    लेख में आपने शर्मा जी से कहा कि:
    “क्या आपकी सोच यह है कि लड़का होना इतनी अच्छी बात है कि जो ईश्वर के करीब होगा उसके घर में लड़कों की भरमार होगी और जो ईश्वर से दूर होगा उसे ईश्वर लड़कियां देगा? आपकी इस सोच पर मुझे गुस्सा नहीं अपितु दया आ रही है.”
    आपने पहले तो शर्माजी की सोच में खुद ब खुद सोचा, और अपनी सोच को शर्माजी ने जैसे कहा हो… स्थापित कर दिया। जबकि अगली पंक्ति में वे उनकी एक मात्र बेटी फ़तिमा होने का उल्लेख करते है। घुमा फ़िराकर कर विषय को लडका लडकी में तब्दील कर दिया। रसूल के वंशजों से विषय को आप अपने परिवार अपनी बेटियों तक ले आये। परिणाम यह हुआ कि पाठकों नें समझा यह लिंग असमान्ता की बहस है,मेरी बात का समर्थन आपके लेख पर आई टिप्पनियां कर रही है।
    संज्ञान लिजिये!!

    Tarkeshwar Giri said...

    अरे बाप रे बाप, पहले तो शर्मा जी सहनावज जी दोनों को बधाई , इस लम्बी बहस के लिए.

    एजाज भाई अपने ऐसा क्यों कहा की हिन्दू नारी और बेचारी. नारी तो हर धर्म की बेचारी है. आप खुद ही देख ले, पूरी दुनिया की नारियों को और भारतीय नारियों को. हिन्दू नारियों ने तो पूरी दुनिया में तहलका मचा रखा है तो अपने बेचारी कैसे कह दिया. भाई मुझे तो इस बात पर एतराज है.

    दूसरी बात ये की भाई अनवर जी , आप ऐसा क्यों कहते हैं की हिन्दू धर्म को लोगो ने बिगाड़ रखा है. शायद आपको ये भी पता होगा की हिन्दू धर्म को किसने बिगाड़ा. हिन्दू धर्म को बिगाड़ने वाले भी कोई और नहीं बल्कि यूरोपियन और अरबियन समाज के ही लोग हैं , जिन्होंने हमारे धार्मिक ग्रंथो का चेहरा ही बदल करके रख दिया. और सबसे बड़ी बात तो ये की हिन्दू कोई धर्म है ही नहीं, हिन्दू तो एक सभ्यता और एक संस्कार है जिसमे आप और में भी शामिल है.

    सहनवाज भाई बढ़िया मुद्दा ले करके आये आप,

    Shah Nawaz said...

    मित्र! इसमें मैंने बात कहाँ घुमाई? क्या शर्मा जी की नीचे लिखी बात से यह बात स्पष्ट नहीं होती जो मैंने लिखी है?

    एक बार फिर से पढ़कर देखिये....
    "अल्लाह के इतने करीब होते हुए और करीब चालीस औरतें होते हुए अल्लाह ने मुहम्मद को सिर्फ एक ही लड़का दिया था"

    सुज्ञ said...

    शाह नवाज़ साहब,

    पूरे पेरेग्राफ को लें,क्या केवल लड़के की बात हो रही है?
    और पूरा लेख तो बेटी से चले वंश का जिक्र कर रहा है।

    एक बार आगे का पढ़कर देखिये....
    मुहम्मद की पहिली पत्नी खदीजा से सिर्फ एक लड़की फातिमा हुई थी .जिसके बारे में मेरी पिछली पोस्ट में दिया गया है अगर हम फातिमा को मुहम्मद का वंशज मानें तो आप देखेंगे कि......

    सुज्ञ said...

    शाह नवाज़ साहब,

    मेरे तो शंका समाधान की जगह, विरोधाभाषों की श्रंखला का सर्जन हो रहा है।
    “जिन्होने स्वयं को अल्लाह की राह में समर्पित कर दिया है, जो कलमा मात्र पढते ही नहिं, रोम रोम में बसा लेते हैं,”
    फ़िर भी “ईश्वर स्वयं जानता है कि किस के ह्रदय की गहराई में क्या है,”???
    “परीक्षा वह इसलिए लेता है कि कोई उसपर यह आरोप या आक्षेप न लगा सके कि उसे तो मौका ही नहीं मिला, वर्ना वह भी अवश्य उसके बताये हुए रस्ते पर चलता.”

    यह फ़िर ‘बताया रास्ता’ कोनसा? जब वह अन्तर्मन से दीन व इमान पर है।
    हम उसके बताए रास्ते पर चलें,और हम ही न जानें हम सही चल रहे है। या गलत, ईश्वर ही केवल जानता है।
    अथवा वह जब तक परिक्षाएं लेता रहे,समझ लो हमारी ह्रदय की गहराईयों में हक़(सत्य) बात नहीं है।
    देते रहें परिक्षा जब तक अन्तिम परिक्षा ‘शहादत’ पूरी नहिं हो जाती? फ़िर तो न मौका है,न सोचने का वक्त।
    फ़िर तो कोनसा मार्ग सही है,कोनसा गलत हम कभी भी नहिं जान पायेंगे।
    क्यों कि अल्लाह ही बेहतर जानता है!!

    Shah Nawaz said...

    @ सुज्ञ

    आप बातों में स्वयं उलझ रहे हैं, जबकि बात बहुत ही आसान है. अभी कहीं के लिए निकल रहा हूँ. फिर कोशिश करूँगा की आपको विस्तार से समझा सकूँ.

    Maria Mcclain said...

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    Shah Nawaz said...

    मेरे दोस्त परीक्षा हक के दिल में होने या न होने की ही नहीं होती है बल्कि इस बात की भी होती है की ईमान का दर्जा क्या है? इसे आप कुछ ऐसे भी समझ सकते हो की कोई तो 33 प्रतिशत अंक लेकर उत्तीर्ण होता है और किसी-किसी के शत प्रतिशत अंक आते हैं. अब अगर शत प्रतिशत अंको के लिए मेहनत करने वाला अधिक मेहनत करता है तो क्या इसका मतलब यह होगा कि उसे अपने पास होने का ही यकीन नहीं है? नहीं बल्कि वह अधिक मेहनत अधिक से अधिक अंकों के लिए करता है.

    अब आप यह बताइए कि अगर शिक्षक को पता है शत-प्रतिशत मेहनत करने वाला पास हो जाएगा तो वह उसकी मेहनत को रोक दे और परीक्षा दिए बिना ही पास कर दे. अब जब उसने परीक्षा दी ही नहीं तो उसे केवल पास ही किया जा सकता है उसके अंकों का निर्धारण किसी भी विधि से नहीं हो सकता है. वहीँ दुसरे शिक्षार्थी मेहनत करके परीक्षा में बैठे और शत-प्रतिशत अंकों से पास हो जाएँ. हालाँकि पहला विद्यार्थी बिना मेहनत के ही पास तो हो गया लेकिन क्या उसके साथ अन्याय नहीं हुआ?

    दर असल आपको सारा विरोधाभास इसलिए नज़र आ रहा है क्योंकि शायद आपके हिसाब से दो ही निर्णय हैं "पास होना और फेल होना". जबकि असलियत में पास और फेल होने के 100 प्रतिशत से भी कहीं अधिक दर्जे हैं. लेकिन इन सबके गूढ़ में जाना थोडा सा मुश्किल है, हालाँकि बहुत मुश्किल नहीं. आप कोशिश करें तो समझ सकते हैं.

    सलीम ख़ान said...

    भाई शाहनवाज़ आपने बहुत ही सरल तरीक़े से भंडाफोडू की बातों का जवाब दिया... और इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं...

    वैसे मैंने पता लगा लिया है कि यह कौन है ??? यह डेल्ही से है और हम सबको जानते/ती भी है !!!

    अंदाजा यही कहता है इंशा अल्लाह फिर मिलेंगे !!!

    सलीम ख़ान
    9838659380

    सत्य गौतम said...

    भगवान बुद्ध द्वारा की धार्मिक क्रांति के फलस्वरूप सात सौ वषोर्ं तक भारत में जातिवाद दब कर मानवतावाद का बोलबाला रहा। इतिहासवेत्ता जानते हैं कि ये ही सात सौ वर्ष भारतवर्ष का स्वर्णयुग है। इसी काल में भारत में अशोक और चंद्रगुप्त जैसे सम्राट हुए, जिनकी यूरोप और एशिया के महान्‌ सम्राटों से मैत्राी रही। यही वह काल है जब भारत में साहित्य और दर्शन एवं शिल्पकला, चित्राकला, स्थापत्यकला इत्यादि कलाओं की श्लाघनीय उन्नति हुई। किन्तु देश के अभ्युदय को जातिवाद रूपी अजगर निगल गया। अंतिम मौर्य सम्राट महाराज वृहद्रथ को मार कर उनके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्रा ने राज सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया और अपना शुंगवंशीय ब्राह्मण राज्य चलाया। इस ब्राह्मण राज्य में बौद्धों पर अमानुषी अत्याचार होने लगा। बौद्ध विहारों, बौद्ध विद्यालयों और बौद्ध मूर्तियों को नष्ट किया जाने लगा और बौद्ध भिक्षुओं, स्थविरों और महास्थविरों को इस तरह सताया और त्राास दिया जाने लगा कि बेचारे देश छोड़ कर विदेशों को भाग गये
    http://buddhambedkar.blogspot.com/2010/06/blog-post_1769.html

    सुज्ञ said...

    शाह नवाज़ साहब,
    आप तो और भी ज्यादा उल्झने पैदा कर रहे है,पहले तो यह उदाहरण अनरिलेवेन्ट है,उदाहरण एवं हमारी चर्चा में परिक्षा कोमन होते हुए भी
    एक बुद्धि की परिक्षा है तो दूसरी दीन-ए-ईमान की।
    ज्ञान तो स्टेप बाय स्टेप वृद्धि को प्राप्त होता है,अत:दर्जे भी मुमकिन है।
    पर दीन-ए-ईमान(आस्था)?वो टुकडो में कैसे सम्भव है? चलो एक बार मान भी लें ईमान के भी दर्जे होते है पर किसी अन्तिम दर्जे 'पूर्ण ईमान' पर पूर्ण विराम तो होना ही चाहीए।
    हमेशा शत प्रतिशत अंक लाने वाला विद्यार्थी इस बार भी शतप्रतिशत अंक के लिये आवश्यक श्रम करेगा,पर लाख परिश्रम के बाद भी शतप्रतिशत अंक से अधिक सम्भव नहिं हैं।और यही तो मैं पुछ्ता हुं ऐसा विद्यार्थी क्यों अज्ञान्ता में रहे कि मैं पास होउन्गा या फ़ेल।
    स्कालर विद्यार्थी की यह अनिश्चित स्थिती क्यों?बजाय कि वह अपने परिक्षक पर शक करे।
    कईं स्कालर विद्यार्थीओं को क्षमता के अनुसार अगले दर्जे में प्रवेश देते हैं,और यह किसी के साथ अन्याय नहीं होता।
    मैने तो सुना था दो ही निर्णय है,मानने वाले और इन्कार करने वाले।
    मानने वालों को स्वर्ग भेजा जायेगा और इन्कार करने वालो की जगह नरक़ में होगी।इस्लाम तो बडा सरल है,यह गूढ़ता कहां से आई।
    कोशिश का पूरा भार मुझ अकेले पर कहां दाल रहे हैं।

    talib د عا ؤ ں کا طا لب said...

    मुहतरम मुहब्बी भाई,
    अस्सलाम अल्लैकुम व्राह्मतुल्लाह वबराकाताहू !
    मैं भी हमारी अंजुमन का एक अदना सा मेंबर हूँ.हाँ कुछ सबब हैं जिसके बायस मैं वहाँ फिलवक कुछ ताऊन दे पाने में क़ासिर हूँ. हाँ कमेन्ट करने की हत्तल इमकान कोशां रहता हूँ.

    अंजुमन में ब्लॉग लिंक देने का रिवाज नहीं है.अच्छी बात है.
    लेकिन बिरादरान !! आप लोग अपने ब्लॉग पर तो 'दीन-दुन्या' का लिंक बसद शौक़ दे सकते हैं.मैंने जितने लिंक मिल सके हैं देने की कोशिश की है.और हाँ कभी फुर्सत मिले तो वहाँ घूम भी आया करें, क्या ज़हमत होगी !! और वक़्त रहा तो चंद अलफ़ाज़ नवाज़ आयें, मैं फ़र्त -ए -मुसर्रत से झूम जाऊं !

    उम्मीद की इस अदने सी गुज़ारिश को नज़र अंदाज़ नहीं किया जाएगा !

    वस्सलाम

    dhiru singh {धीरू सिंह} said...

    आखिर क्या हासिल होगा इस बहस से जो कोई शर्मा जी ने शुरु की है .

    Dr. Ayaz ahmad said...

    हासिल बहुत कुछ होगा बस आप ईमानदारी से अधय्यन करें और सही को सही कहें

    Shah Nawaz said...

    जैसा की मैंने पहले भी लिखा था की परीक्षा केवल आस्था की ही नहीं होती है, बल्कि आस्था होने के बाद की परीक्षा अलग तरह की होती है, जैसे की किसी विशेष मौके पर क्या कदम उठाया गया? यह परीक्षा जीवन के साथ-साथ चलती रहती है और जीवन के हर मोड़ पर होती है. इसको समझने के लिए कुछ उदहारण लेते हैं.

    अमीर और गरीब के लिए परीक्षा:
    अमीर व्यक्ति ने पैसे सही कार्यों को करके कमाए हैं या गलत कार्यों द्वारा? उनको सही कार्यों में खर्च करता है या बुराई के कार्यो में? ईश्वर का धन्यवाद करता है या या कहता है कि "यह पैसा तो मैंने अपनी चतुराई से कमाया, इसमें ईश्वर से क्या लेना-देना?" वहीँ अगर कोई गरीब है तब भी ईश्वर देखता है कि यह इस हाल के लिए भी ईश्वर का धन्यवाद करता है या नहीं? मेहनत और इमानदारी से पैसा कमाने कि कोशिश करता है या फिर बुरे कार्यो के द्वारा अपनी आजीविका चलने की कोशिश करता है, इत्यादि....
    ईश्वर के बीमारियों को देने के कारणों में से एक कारन यह भी होता है कि व्यक्ति उसको (यानि ईश्वर को) पहचान सके कि सेहत और बीमारी दोनों ईश्वर के हाथ में हैं. वह जब चाहता है सेहत देता है जब चाहता है बीमारी. वही, वह बिमारियों के बदले में पापो को भी क्षमा कर देता है. यहाँ परीक्षा यह भी हो सकती है कि बीमार व्यक्ति यह कहता है कि "हे ईश्वर, इस हाल में भी तेरा शुक्र है!", या फिर यह कहता है "हाय! हाय! कैसा निर्दयी ईश्वर है जिसने मुझे इस परेशानी में डाल दिया?".

    Shah Nawaz said...

    @ dhiru singh {धीरू सिंह}

    धीरू सिंह जी मेरे भी मानना है कि बहस आपस में कड़वाहट पैदा करती है लेकिन अगर यह अच्छी भाषा और एक-दुसरे की भावनाओं के सम्मान के साथ तथा उचित तर्कों से की जाए तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है.

    इसके अलावा बहस से निकले परिणाम को ग्रहण कर लेना ही अक्लमंदी का काम है. किसी बात को समझ कर भी केवल दिखावे के लिए अड़े रहना तथा बहस को हार जीत के रूप में देखने दुर्जनों का कार्य होता है.

    वहीँ किसी सोए हुए मनुष्य को तो जगाया जा सकता है लेकिन सोने का नाटक करने वाले को जगाना नामुमकिन होता है.

    Mohammed Umar Kairanvi said...

    माशा अल्‍लाह

    सुज्ञ said...

    शाह नवाज़ साहब,
    शर्माजी तो आये ही नहीँ,और हमारी ही चर्चा चल पडी हैँ,खेर....
    यह बात आपने ठीक ही कही...
    ...बहस से निकले परिणाम को ग्रहण कर लेना ही अक्लमंदी का काम है. किसी बात को समझ कर भी केवल दिखावे के लिए अड़े रहना तथा बहस को हार जीत के रूप में देखना दुर्जनों का कार्य होता है....
    अब चर्चा,
    कलमा को मानने का अर्थ है,कुरआन को मानना.कुरआन को मानने से तात्पर्य है उसके सम्पूर्ण उपदेशोँ को मानना व अपनाना (जिसमेँ आप के दिये ध्येयोँ मेँ सर्वोत्तम ध्येय सामिल है)इसे ही तो ईमान कह्ते हैँ.
    माने लेकिन सर्वगुण अपनाए नहिँ तो ईमान कैसा,और किस्तोँ या टुकडोँ मेँ ईमान लाये तो ईमान नाम कैसे रहा.थोडा थोडा अपनाने वाला तो पहले से ही शंकाशील है,शंका व ईमान दोनो साथ हो ही नहीँ सकते.
    अर्थार्त जिस बिमार मेँ ईमान है,कह्ता है "हे ईश्वर, इस हाल में भी तेरा शुक्र है!", और जिसमेँ ईमान नहीँ कहेगा "हाय! हाय! कैसा निर्दयी ईश्वर है जिसने मुझे इस परेशानी में डाल दिया?".क्योँकि वो नादान है,दींन ए ईमान को समझा ही नहीँ.

    DR. ANWER JAMAL said...

    सभी भाइयों को इत्तिला दी जाती है कि आज 2.50 बजे दोपहर डा. कान्ता के नर्सिंग होम में
    मेरी वाइफ़ ने एक मासूम सी बेटी को अल्लाह के फ़ज़्ल से जन्म दिया है। उसकी कमर पर एक खुला हुआ ज़ख्म है और रीढ़ की हड्डी में पस है। उसकी दोनों टांगों में हरकत भी नहीं है। डिलीवरी नॉर्मल हुई है लेकिन बच्ची को मज़ीद इलाज की ज़रूरत है। मां की हालत ठीक है। अल्लाह का शुक्र है। वही हमारा रब है और उसी पर हम भरोसा करते हैं। अपनी हिकमतों को वही बेहतर जानता है। हमारी ज़िम्मेदारी अपने फ़र्ज़ को बेहतरीन तरीक़े से अदा करना है। सभी दुआगो साहिबान से मज़ीद दुआ की इल्तजा है। अब ब्लॉगिंग शायद नियमित नहीं रह पायेगी। बच्ची के लिये भी दौड़भाग करनी पड़ेगी।

    सत्य गौतम said...
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    सत्य गौतम said...

    दशरथ ने होता, अवयवु और युवध नामक तीन पुरोहितों से ''अपनी तीनों रानियों से सम्भोग करने की प्रार्थना की।'' पुरोहितों ने ''अपने अभिलषित समय तक उनके साथ यथेच्छ सम्भोग करके उन्हें राजा दशरथ को वापस कर दी।'' (पृ. 11) ऐसे वर्णन न तथ्यपूर्ण कहे जायेंगे, न अस्मितामूलक, बल्कि कुत्सापूर्ण कहे जाऐंगे। ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यवस्था में दलितों के साथ स्त्रिायां भी उत्पीड़ित हुई हैं। कौशल्या आदि को उनका वृद्ध नपुंसक पति अगर पुरोहितों को समर्पित करता है और पुरोहित उन रानियों से यथेच्छ सम्भोग करते हैं तो इससे स्त्राी की परवशता ही साबित होती है। दलित स्त्राीवाद ने जिसे ढांचे का विकास किया है, वह पेरियार की इस दृष्टि से बहुत अलग है। पेरियार का नजरिया उनके उपशीर्षकों से भी समझ में आता है, ÷दशरथ का कमीनापन' (पृ. 33), ÷सीता की मूर्खता', (पृ. 35), ÷रावण की महानता' (पृ. 38), इत्यादि।
    http://www.tadbhav.com/dalit_issue/tasber_ka_dusra.html#tasber

    डा. अरुणा कपूर. said...

    शर्माजी कौन से युग में जी रहे है,जो बेटा और बेटी में इतना फर्क समझ रहे है?.... ईश्वर या अल्ल्हाह ने जब मनुष्य नाम के प्राणि का निर्माण किया तो स्त्री और पुरुष दोनों को इस धरती पर उतारा!... अगर उपरवाला भेद-भाव नहीं कर रहा, तो मनुष्य क्यों कर रहे है?.... सार्थक पोस्ट, धन्यवाद शाह नवाज जी!

    Naushad said...

    असल में शर्मा जी को सेजोफेर्निया नाम की बीमारी हो गयी है जिसकी वजह से ये ऐसी बातें करने लगें हैं डाक्टर ने कहा हैं के वो इलाज कर रहे हैं शर्मा जी जल्द ही ठीक हो जायेंगे फिर सही सही बातें करने लगेंगे

    Shabbir Khan said...

    Nice Post!!!


    B N Sharma (Kaan ka kachcha) Please Visit This site -
    http://www.answering-christianity.com

    Parimal Mukherjee said...

    But I thank you faithfreedom for daring to stand because you are the true heroes of the land!



    Dear Dee Anna

    You are lucky that you do not live in an Islamic country or you would not have had the chance to leave Islam. Millions of so called Muslims are desperate to leave this cult but they know that they can’t or they would pay it with their lives.

    Wish you all the best

    Ali Sina



    2007/02/07

    Yes my friend I assure you I do tell people about your site. In fact I talked to one of the Muhammad worshipers, (because basically that’s what Islam really boils down to) I talked to one of the Muhammad worshipers about your site and explained how accurate you seemed. I was hoping for some response such as: “Well Islam has done some wrong and I’m so sorry for that.” Instead he said, you guys were a bunch of Baptist preachers who got together and made all these sites to make Islam look bad! And he told me how educated he was and basically implied that because he is so educated and I am not, he is right and I am wrong.

    I was a slave for the shackles I put on my self. But I did it out of love. I knew first hand what it is like to be a victim of discrimination, a victim of hate a victim of evil. And in my heart I could not bare that others should be as I had been, so full of pain and sorrow. Desperate to belong in a world, where I did not know my place, I struggled to conform, struggled to fit in. But there was always something different about me. I always knew all forms of abuse. I knew this abuse even as a baby. But of all these forms of abuse that which caused me the utmost suffering was the lack of love. I was starved for love starved to matter in this world. And to starve for love is a pain greater than I could bear and it was something I would not wish on my worst enemy. As I grew older I saw that it was not only me and my siblings who suffered in this world, but the world was full of suffering people. People starved for love and a place to belong. And so I decided I would make it my goal to love the world right into a better place for us all. I was doing that play it forward thing before there was ever a movie about it.

    Parimal Mukherjee said...

    I grew up raised by many different people, from Atheist to strict religious. My step grandfather was atheist, my grandmother a catholic, and both were very abusive to me. Religion was a constant in my life. And as I passed from one family to another and to the next, abuse and hellfire and brimstone teachings were a constant. But I rebelled against the notion that a good loving god could be so psychotic and I raised my voice and said so. I said so not because I wanted to hurt the believers but because I wanted to love the disbeliever as well as the believers. For that I was demonized and called satan at times etc. Still I loved the believers, so I tried to please them, but I also loved the disbelievers. This left me torn in the middle somehow. Out of love I walked away from it all.

    When I learned how many religions there are I decided perhaps my fate, my destiny in my quest for a better world was to find the golden sparks within each faith and use them to help humanity love one another as equals not with all the differences and divisions, I was so happy at last I had found my path.

    Sept 11 happened to us all and my first response when I found out Osama was a Muslim and there was a religion called Islam, was love and mercy. I wanted to ensure that not all of Islam was persecuted for what Osama had done. So I defended Islam and Muslims. I still didn’t know squat about it though. Some Muslims told me that Islam was about peace and love and Muhammad was a great prophet of peace who love and liberated women. They made him sound Christ like, and they made Islam sound like some small persecuted religion of peace and non violence. And all I felt was an innocent love and acceptance, I sought to embrace Islam with love, to love and be loved and work together for a better world for all people. But from the start I was lied to. They depicted Muslims as the poor peaceful yet persecuted minority. The truth is that Islam is the persecutor of minorities. Still at first, though I had questions about the faith and the founder of the faith, all I wanted was to love and be loved. After all, I had had some very bad experiences in my own Christian background. I had been demonized so many times as a child I began to be truly afraid the devil was in me. After all I was accused so many times, because I would not bow, nor would I submit to anything as barbaric as eternal hell for humanity.

    Anyway, after I embraced Islam with love I discovered too late that Islam was even worse and its eternal hell even more barbaric. A submitted slave who dares to question the faith is as bad as a disbeliever. Once again I was demonized. Demonized because I dared to love, dared to stand for the disbelievers as equal to the believers. Now I stand again and walk away. Now yet again I am cast down and again demonized and satanized.

    But I have a message and that message is: I do not walk away from Islam because I hate the believers. Oh no! I walk away because, I love the disbelievers. And I am thoroughly ashamed of how we the believers have treated them. And yet still I love you as the believers but I love the disbelievers too. I did not bow for the belief that demonized the disbelievers and condemned them to eternal hellfire in my own original religion, why would I bow for such a barbaric belief in a new religion that is even crueler to the disbeliever? You can make me the great Satan in your minds, you can demonize me if you must, but I walk away, not because I hate but because I LOVE! I love the disbeliever as much as I love the believers and never will I submit to any eternal evil cast upon them. You may vilify me and satanize me if you have to, but someday, someday you will have to ask your selves why your devil loves more than your god. I am and have been a slave, but now I am setting my self free.

    P.S. I love you all! I think you are the great heroes of the world and the most beautiful people and I am ever so grateful that you stood. I love all of you thank you faithfreedom!

    Parimal Mukherjee said...

    Dear Dee Anna

    I believe you have found the essence of religion within yourself. Religion is a way to find God in our hearts and to love our fellow being. You have done both on your own. You reached your destination, flying. You took no roads. All roads were proven to be torturous and thorny for you. Yes, love is the essence of religion. This is the eternal principle of all good philosophies and faiths. Once you reach the point that you love all mankind and become blind to the differences that separate us, you have reached the pinnacle of humanness. This is a lofty station, at the reach of all of us and yet it is the path less trodden.

    Many people who defend Islam do it out of the goodness in their hearts. They have the best of intentions. Alas the road to hell is paved with good intentions. In Persian we say, kindness to the wolf is cruelty to the sheep. Unfortunately the world is reluctant to see Muslims as wolves. Muslims are wolves for what they believe and what they practice. It is their demonic cult that converts them into deceitful and hatemongering murderers. Otherwise we are all born innocent and pure. We become who we are through indoctrination. You were lied to, like all of us. Every Muslim is lied to and he then takes upon himself to perpetuate that lie, to keep lying to himself and to others. But we are free. No amount of indoctrination can overcome our free will. Once we come to age and can make choices on our own then the excuse that I was indoctrinated is not a valid excuse anymore. We become responsible for our actions, for what we believe and what we do. Muslims are not innocent. They are guilty for what they believe and for what they do. There is no excuse for hating our fellow being. Foolishness is not an excuse.

    Ali Sina

    Parimal Mukherjee said...

    Copied fro 'Faith Freedom .Org My Journey to Freedom
    by Meher Ali Khan

    2006/02/25

    When on the otherwise fine morning of 9/11, I switched on the TV and witnessed two planes hit the WTC with the building falling apart like a pack of card – I was amazed, stunned and delighted. A fitting response for the evil US foreign policy, especially towards Palestine. There was no doubt in my mind that this event must have been orchestrated by a Muslim group, most likely by Osama bin Laden but all that played in my mind was that it was all justified; it was necessary to teach America a lesson. Yet, I was never a fan of bin Laden - I would never have wanted his ideology take hold in my own country.

    As the first reaction, I jumped up, out of delight, with a loud exclamatory noise. My housemate, a Hindu guy, came out to my shouting. He had already had a glimpse of event. He naturally did not enjoy my delight and glum faced he just went back to his room to get ready for rushing to work. He probably knew it was useless to talk with this folk. Probably he was too depressed to talk about this appalling event.

    Next few weeks, I spent explaining to my mates and colleagues about how US has been killing the Palestinians, US's bad policies towards the Islamic world, US sanctions on Iraq, US troops bases in Saudi Arabia and what not.

    This is what I was doing despite the fact that I was hardly a Muslim. Although born to religious parents in South Asia – I was never pressed to follow religious rituals and neither did I ever bother to engage myself in those stuffs. My only religious devotion was intermittent praying on Friday Juma and on the 2 yearly days of Eid. I would do fasting only on those days I would be invited for Iftar (fast-breaking) party by friend and relatives. Hindus have been my good friends, as exemplified my having a Hindu housemate. Yet, that's the kind of reaction I had of the 9/11 attack. I kind of celebrated the tragic event of killing so many innocent people who had nothing to do with Palestine or US foreign policy.

    Parimal Mukherjee said...

    In a week after 9/11 attack, I called a childhood friend back home – who could not pass his 10th grade but was a pious person. I was in a goading mood while discussing the WTC attack with him. He was rather cold to my zeal. He was indeed concerned that US might start deporting the Muslims, as rumors were rife. He had depended on me for financial help from time to time. He knows that my family and a host of relatives and friends depend on me for money regularly. All he said, "I don't care whether Palestinians die or not. Palestinians are never going to come with money for your family or for me. Neither are we going to come to help the Palestinians even if they die of hunger. Your staying in the US is important for your family, relatives and friends. Make sure, you don't get into troubles."

    I was rather disappointed with his cold response to my elation of the 9/11 event. I had already called my parents the day-after 9/11 and obviously had described the event with glee. They too were not so interested. They are not well-educated people. They don’t keep up with the world. They hardly bothered to know what’s happening in Palestine. They reminded me not to get into troubles - they depended on my staying in the US. Getting a check at the end of the month from me was the most important thing – what is happening to Palestinian hardly bore any importance to them. I was disappointed with the callous responses of my friend and my parents towards the Muslim brothers in Palestine.

    I called my brothers and quite surprisingly they were as elated as I was. I felt very good talking to them. My brothers were well educated in science and well-respected people in the locality unlike my friend and my parents. I felt quite happy talking to them that my brothers at least cared for the undeserved suffering of people in Palestine. I thought they were educated – so they responded to the call of their conscience. Justice mattered for them. I felt proud – they have become truly educated and conscientious human being. I didn't talk to my friend for some times after that.

    As I was looking for all sorts of news on the web, I stumbled on to this website www.faithfreedom.org (FFI) about a month after 9/11. First time, I came across such a site. I took a couple of days reading and I was extremely disappointed and angry with Dr. Ali Sina and other writers on the site. Quickly I took a few pennames and started writing all sorts of abusive comments against FFI and its writers.

    Initially I would mainly write abusive comments without making any solid reference to the points raised by the Islam-bashers. But every time, they would come back with references from the Islamic sources, Koran and Hadiths to shut me up. I thought they were misinterpreting the Quran. I thought there is special meaning in those verses which human knowledge cannot comprehend although they may sound very unsavory; Allah is beyond human comprehension; human logic may not fit to Allah’s; and all such kind of things.

    Parimal Mukherjee said...

    One thing I have to make clear that when I started writing abusing retorts to these Islam-bashers in FFI, I never had read the Koran, or the Hadiths. My knowledge of Islam was from hearsay. After doing this kind of tug of war with the Islam-bashers on FFI for about 6-7 months – I slowly started looking into the Koran and Hadiths. I found online Koran (in multiple English translations) and Hadiths. I slowly started cross-checking the references. Then I got a Koran in my mother tongue. All of the translations were mostly agreeable and also were almost agreeable to the interpretations of these Islam-bashers of FFI. I started becoming quiet on FFI. I kept reading more and more. I started questioning if I wanted to copy-cat Prophet Muhammad – who, I believed, was the most perfect man for all times for 40 years of my life. I started questioning if I want to be an ideal man and have 10-15 wives, a few concubines and wage numerous wars against the idolaters, Jews and Christians. Growing up amongst the Hindu majority of the subcontinent - I thought if I would model myself after Muhammad - I should've waged wars against the Hindus (idolaters) in my neighborhood. In stead, I found many good friends amongst the Hindus - who had been excellent friends, who had been nice and honest people. They have been hard-working people as compared to many Muslims peers. Question after question started striking my head. I was getting mad.

    I started contemplating what the world will be like if every Muslim had modeled himself after Prophet Muhammad. I wondered how much blood of my Hindu neighbors would have flown had every Muslims had acted the same way like Prophet Muhammad and his closest of disciples (Sahabas) who are considered the finest bunch of people in Islam. I started visioning, in my mind, all sorts of gory pictures in the neighborhood I grew up in. My idolater Hindu neighbors – hard working, honest and affluent like the Jew and Christian tribes of Prophet Muhammad’s neighborhood of Medina. I started visioning how those sweet, nice and beautiful sisters of my Hindu friends are falling at the lustful hands of my Muslims peers. One day about one year after the 9/11, I called my Hindu friend to a restaurant and ordered pork. He was in a daze. Because of me, he never ever brought pork home although I always cooked beef which my Hindu friend never touched because of the prohibition of his religion. I did not know when I had left Islam but that day formalized and ascertained that I was not a Muslims any more.

    Ravi kumar said...

    चर्चा का जड़ 100 % ग़लत है. जड़ की कॉपी है. लेकिन पेस्ट करने के लिए यह यह जगह ठीक नही है. अगर पेस्ट किया भी जाय तो आडमिन उसे डेलीट कर देगा.

    my experience said...

    sharma ka dimag kharab ho gaya hai us ko ijaj ki zaroorat hai

    my experience said...

    sharma ek baat bata teri nazar mai tu jo kuchh likh raha sahi hai lakin muslim logo ki nazar mai tu galat hai agar tujhe koi musalman markar is duniya se hi utha de tou woh sahi karega ya galat tere bhagwan ki nazar tu sahi hoga ya galat

    my experience said...

    Sugya ji muhammad (a.s) ke vanshjo ne jo kurbani di hai ya jo imtehaan diya hai woh sirf isliye diya hai ki duniya ko bata de ki allah hai jo allah ko na mane woh sabse bada murkh hai karbala mai itni pareshani mai bhi unhone allah ko nahi chhoda na hi allah ko koi dosh diya ye tou logo ko bataya ki allah par yakin karo allah ne un ko chuna imtehaan dene ke liye or ye chhoti baat nahi hai allah ne bhi imam husain ko kurbaani ke liye chun kar bata diya muhammad or unke vanshaj allah ke kitne kareeb hai

    Dinesh Bang said...
    This comment has been removed by the author.
    Dinesh Bang said...

    MERA SPASHAT ABHIMAT HAI KUARAN DHARM AUR ADHARM KE BICH KA ANTAR AUR PARINAM KI VYAKHYA KARTA HAI.KEVAL ALLAAH KO POOJO MATLAB KEVAL DHARM KO POOJO MATLAB ANYAY KE AGE NA JHHUKO.KAFIR SE ADHARMIK VYAKTI SE HAI MATLAB DUSHT,RAKCHHAS,VAHSI ITYADI.SRISHTI KE RACHAYITA,PALANHAR AUR SANHARAK KO HUM BRAMHA,VISHNU,MAHESH KE NAM SE SMARN KARTE HAI.KUARN UNHE ALLAH AUR KUCHH LOG PARMESHWAR KE NAM SE HAI VAH PARMSHAKTI KEVAL EK HI.KUARAN AUR MUSLIM KAUM DO ALAG VICHARDHARAYEN HAI.SRISHTI KE AADI SE ABHI TAK ALLAAH KE SABSE NEK BANDE RAM HUE HAIN.JAB JAB DHARATI PAR PAP BADHA HAI ALLAAH NE PAP KO NASHT KARNE KE LIYE APNE NEK BANDE KO AVATARIT KIYA HAI.ARAB KO DHARM KA MARG DIKHANE VALE MOHD.PAGAMBER SAHAB ALLAAH KE NEK BANDE HAI.KUARAN KE ANUSAR RAVAN AUR KANSH KAFIR HAI.