प्रश्न - उत्तर

Posted on
  • Thursday, September 2, 2010
  • by
  • Shah Nawaz
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  • आप यहाँ पर टिपण्णी (Comments) के माध्यम से इस्लाम धर्म से सम्बंधित प्रश्न मालूम कर सकते हैं, अगर किसी को किसी प्रश्न का उत्तर मालूम हो तो वह उसका उत्तर भी दे सकता है. केवल वह प्रश्न ही प्रकाशित किए जाएंगे जिनकी भाषा सभ्य और संयमित होगी. विषय से हटकर की गई टिपण्णी को निरस्त कर दिया जाएगा.

    11 comments:

    Patali-The-Village said...

    जानकारी के लिए धन्यवाद|

    JHAROKHA said...

    Blog jagat men apka svagat hai.Shubhkamnayen

    Surendra Singh Bhamboo said...

    ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    Ravindra Nath said...

    बहुत ही बढिया पहल है आपकी, इस blog के माध्यम से हम सब आपसे अपने प्रश्नो के उत्तर जान सकेगें।

    मैं अपना प्रश्न आपके सम्मुख रखता हूँ:-

    इस्लाम में नसबंदी हराम है तो खतना क्यों नहीं?
    यह दोहरे मापदंड क्यों?

    Shah Nawaz said...

    बच्चे पैदा होने में किसी भी तरह के पूर्णत: रोक को हराम करार दिया गया है, हाँ आंशिक तौर पर रोक से विशेष परिस्थितियों में इजाज़त होती है. जहाँ तक बात खतना के है, यह इस्लाम के पूर्व से चला आ रहा ऐसा कार्य था, जिसके कारण आदमी पाक (स्वच्छ) रहता है. खतना ना होने की स्थिति में मूत्र इत्यादि की बुँदे शरीर के तो बाहर आ जाती हैं, लेकिन अपने-आप पूर्णत: बाहर ना आ पाने के कारण रिस-रिस कर बूंदों के रूप में बाहर आती हैं और शरीर को अवाछ कर देती है, जैसा की खड़े होकर मूत्र त्याग होने की स्थिति में भी होता है. ऐसी स्थिति में बा-श`उर (बुद्धिमान) लोग तो आसानी से सफाई रख सकते हैं, लेकिन इस्लाम कम बुद्धिमानो का भी बराबरी के साथ प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए ऐसी स्थिति से बचने के लिए खतना को अपनाया गया. लेकिन आज भी यह आवश्यक कार्यों में नहीं है, मतलब बिना खतना के भी मुसलमान रहा जा सकता है. हाँ स्वच्छता (पाकी) का ख़याल रखा जाना आवश्यक है, क्योंकि स्वच्छता के बिना नमाज़ (पूजा) नहीं होगी.

    AJAY GUPTA said...

    हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

    DR. ANWER JAMAL said...

    पवित्र कुरआन एक मौज्ज़ा और चमत्कार है।
    यह नफ़रतों को ख़त्म करता है और मुहब्बत पैदा करता है । यह अपने विरोधियों को अपनी ओर खींचता है और अपना बना लेता है। कुरआन इस्लाम का आधार है। इस्लाम हमेशा कुरआन के बल पर फैला है। कुरआन अपनी सत्यता को खुद मनवा रहा है। यह एक ऐसा चमत्कार है जिसे आज भी देखा जा रहा है। स्वामी जी ने पहले कुरआन के विरोध में किताब लिखी लेकिन उनका दिल साफ़ था इसीलिये जब उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ तो उन्होंने सब के सामने कुरआन का सत्य रख दिया और बता दिया कि इस्लाम आतंक नहीं आदर्श है, जो जानना-मानना चाहे वह जान-मान ले कि कल्याण के लिए मुहब्बत की ज़रूरत है नफ़रत की नहीं । वास्तव में सबका मालिक एक है।

    भारतीय मुस्लिम जगत सदा शंकराचार्य जी का आभारी रहेगा कि उन्होंने पवित्र कुरआन की 24 आयतों के पत्रक छापकर नफ़रत फैलाने वाले गुमराहों की अंधेर दुनिया को सत्य के प्रकाश से आलोकित कर दिया है।
    वे धन्यवाद के पात्र हैं और उनके साथ ही भाई ऐजाज़-उल-हक़ भी ,

    कि उन्होंने इंटरनेट परिवार को ईद पर बेहतरीन ईदी भेंट की।
    अल्लाह मालिक, सबका मालिक एक ।
    मान लो उसको और हो जाओ नेक ।।


    इसके बाद भी कुछ लोग सत्य तथ्य को नहीं मानेंगे, उन्हें शैतान समझना चाहिये। उनका काम फ़ित्ने फैलाना होता है। उनके कुछ आक़ा होते हैं वे उनके प्रति जवाबदेह होते हैं। यह किताब उन गुमराह अफ़वाहबाज़ों की शिनाख्त के लिए भी एक बेहतरीन कसौटी का काम देगी।
    शंकराचार्य जी ने बता दिया है कि एक आदर्श भगवाधारी को कैसा होना चाहिये ?
    जिसके भी दिल में भगवा रंग के लिये आदर है, उसे उनका अनुसरण करना चाहिये ताकि आने वाले कल में कोई किसी भी रंग को आंतकवाद से जोड़ने की धृष्टता न कर सके।
    http://vedquran.blogspot.com/2010/09/real-praise-for-sri-krishna-anwer-jamal.html

    DR. ANWER JAMAL said...

    Thanks to a great swami भारतीय मुस्लिम जगत सदा शंकराचार्य जी का आभारी रहेगा कि उन्होंने पवित्र कुरआन की 24 आयतों के पत्रक छापकर नफ़रत फैलाने वाले गुमराहों की अंधेर दुनिया को सत्य के प्रकाश से आलोकित कर दिया है। - Anwer Jamal
    http://mankiduniya.blogspot.com/2010/09/thanks-to-great-swami-24-anwer-jamal.html

    Ravindra Nath said...

    @Shah Nawaz:- बिना खतना के भी मुसलमान रहा जा सकता है और खतना करा कर भी, तो बिना नसबंदी के भी और नसबंदी के साथ भी मुसलमान होने मे क्या परेशानी है।

    Shah Nawaz said...

    बिलकुल रविन्द्र नाथ जी, नसबंदी के साथ भी मुसलमान रहा जा सकता है. क्योंकि मुसलमान होने अथवा ना होने की शर्तों में यह शामिल नहीं है. कोई भी इंसान जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, उसके संदेष्ठा मुहम्मद (स.) को आखिरी संदेष्ठा मानता हो, अच्छी-बुरी तकदीर, चारों आसमानी किताबों (कुरआन में चार किताबों और कुछ प्रष्टो का ज़िक्र है जो की पूर्वर्ती संदेष्ठाओं / ऋषियों को दी गईं), फरिश्तों, मौत के बाद की ज़िन्दगी जैसी इस्लाम की बुनियादी बातों पर विश्वास रखता हो वह चाहे जितने भी गुनाह के कार्य करता हो, वह गुनाहगार तो हो सकता है लेकिन फिर भी मुसलमान ही रहेगा.

    Shah Nawaz said...

    देखिये ईश्वर ने क़यामत तक इस दुनिया में मनुष्यों को भेजना है और जितनी भी आत्माएं अभी मनुष्य के शरीर में प्रवेश करके इस संसार में पैदा नहीं हुई, उन्हें पैदा होना है. और ईश्वर यह कार्य पुरुष-महिला के मिलन से पूरा करता है. इसलिए आप किसी परेशानी इत्यादि के कारण आंशिक तौर पर रोक लगा सकते हैं, लेकिन पूर्णत: रोक लगाना, ईश्वर के कार्य में बाधा डालने जैसा है. अगर कोई किसी परेशानी के कारण बच्चे नहीं चाहता है तो वह परिवार नियोजन के बच्चा पैदा होने में पूर्णत: रोक वाला विकल्प छोड़कर अन्य विकल्प अपना सकता है.